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संस्थाओं पर भरोसा, लोकतंत्र की कसौटी

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अवनीश कुमार गुप्ता
लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन मत डालने की प्रक्रिया नहीं है। वह उस भरोसे का विस्तृत संसार है, जिसमें नागरिक यह विश्वास करता है कि उसके मत का मूल्य है, कानून सबके लिए समान है, न्यायालय निष्पक्ष होकर सुनेगा, प्रशासन बिना भेदभाव के काम करेगा और संवैधानिक संस्थाएँ अपने दायित्वों का निर्वहन किसी तत्काल राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र होकर करेंगी। इसलिए लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती का आकलन केवल मतदान प्रतिशत, सरकार के गठन या राजनीतिक बहुमत से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि नागरिक उन संस्थाओं को कितना विश्वसनीय मानता है जिनके माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके जीवन में दिखाई देती है। संस्था की इमारत नियमों से बनती है, लेकिन उसकी प्रतिष्ठा वर्षों के निष्पक्ष आचरण से निर्मित होती है।

आज संस्थाओं पर भरोसा इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है, क्योंकि सूचना का विस्तार अभूतपूर्व है। नागरिक पहले की तुलना में अधिक प्रश्न पूछता है, सरकारी निर्णयों की तुलना करता है, न्यायिक आदेशों पर चर्चा करता है, चुनावी प्रक्रियाओं को समझने की कोशिश करता है और प्रशासनिक निर्णयों की सार्वजनिक समीक्षा करता है। यह परिवर्तन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी परिपक्वता का संकेत भी हो सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना प्रमाण से अलग होकर आरोप में बदल जाए और दूसरी ओर संस्थाएँ वैध प्रश्नों को भी अविश्वास के रूप में देखने लगें। लोकतंत्र में भरोसे का अर्थ यह नहीं कि संस्थाओं से सवाल न पूछे जाएँ; स्वस्थ व्यवस्था वह है जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता और संस्थागत उत्तरदायित्व एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

न्यायपालिका के संदर्भ में यह अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। न्यायिक संस्था का विश्वास केवल लोकप्रिय या पसंद आने वाले निर्णयों से नहीं बनता, बल्कि निष्पक्ष प्रक्रिया, कारणपूर्ण निर्णय और कानून के समान अनुप्रयोग से बनता है। नागरिक किसी निर्णय से असहमत हो सकता है, फिर भी यदि उसे यह विश्वास हो कि निर्णय प्रमाण, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर हुआ है तो संस्था की विश्वसनीयता बनी रह सकती है। इसके विपरीत मनपसंद निर्णय भी यदि अपारदर्शी प्रक्रिया से आए तो दीर्घकाल में भरोसे को मजबूत नहीं कर सकते। न्याय की प्रतिष्ठा उसकी लोकप्रियता में नहीं, उसकी निष्पक्षता में निहित है।

निर्वाचन व्यवस्था के सामने भी यही चुनौती है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव तभी बने रह सकते हैं जब मतदाता को पूरी प्रक्रिया पर विश्वास हो। मतदाता सूची, नामांकन, मतदान, मतगणना और परिणाम-हर चरण में स्पष्ट नियम और प्रभावी शिकायत-निवारण आवश्यक हैं। निर्वाचन प्रक्रिया पर प्रश्न उठना अपने आप में लोकतंत्र की कमजोरी नहीं है; प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर उपलब्ध न होना चिंता का विषय है। चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता का आधार यही होना चाहिए कि नियम पहले से स्पष्ट हों, उनका समान रूप से पालन हो और विवाद की स्थिति में संवैधानिक उपचार उपलब्ध रहे।

लेकिन संस्थाओं पर भरोसा केवल न्यायपालिका और निर्वाचन व्यवस्था का विषय नहीं है। संसद लोकतांत्रिक विश्वास की महत्वपूर्ण आधारशिला है। नागरिक यह देखना चाहता है कि उसके प्रतिनिधि केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में समय न बिताएँ, बल्कि कानूनों की गुणवत्ता, जनहित और शासन की जवाबदेही पर गंभीर विमर्श करें। विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करना नहीं और सत्ता पक्ष की भूमिका केवल निर्णय लेना नहीं है। दोनों की संवैधानिक जिम्मेदारी लोकतांत्रिक विमर्श को सार्थक बनाना है। बहुमत सरकार चलाने का अधिकार देता है, लेकिन विवेकपूर्ण शासन करने की जिम्मेदारी भी उसी के साथ आती है।

कार्यपालिका और प्रशासन की भूमिका नागरिक के लिए सबसे प्रत्यक्ष है। न्यायालय का निर्णय और संसद का कानून अंततः प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से नागरिक तक पहुँचता है। किसी छोटे कस्बे में प्रमाणपत्र के लिए लगने वाला अनावश्यक समय, किसान को मिलने वाली सहायता में देरी, पेंशन के लिए बार-बार कार्यालय जाना या शिकायत का महीनों तक लंबित रहना नागरिक के लिए लोकतंत्र की वास्तविक अनुभूति बन जाता है। इसलिए संस्थागत भरोसा बड़े संवैधानिक विमर्श से उतना ही जुड़ा है जितना रोजमर्रा की प्रशासनिक दक्षता से। जिस नागरिक को व्यवस्था अपने प्रति संवेदनशील दिखाई देती है, उसके लिए लोकतंत्र कोई अमूर्त विचार नहीं रहता; वह जीवन का अनुभव बन जाता है।

तकनीक ने इस संबंध को और जटिल बनाया है। डिजिटल शासन ने सेवाओं की गति और पहुँच बढ़ाई है, लेकिन सूचना की अधिकता ने भ्रम की चुनौती भी पैदा की है। आधी-अधूरी जानकारी, भ्रामक सामग्री और कृत्रिम रूप से तैयार संदेश कुछ ही समय में बड़ी आबादी तक पहुँच सकते हैं। ऐसी स्थिति में संस्थाओं के सामने केवल सही निर्णय लेने की नहीं, बल्कि सही समय पर सही सूचना उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। पारदर्शिता का अर्थ हर संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करना नहीं, बल्कि नागरिक को यह समझने योग्य आधार देना है कि निर्णय क्यों लिया गया, उसकी प्रक्रिया क्या रही और शिकायत की स्थिति में अगला रास्ता क्या है। सूचना का अभाव कई बार गलत सूचना के लिए खाली स्थान तैयार कर देता है।

यहाँ मीडिया की भूमिका निर्णायक हो जाती है। स्वतंत्र पत्रकारिता संस्थाओं की निगरानी करती है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता भी तथ्य और प्रमाण पर निर्भर करती है। समाचार और टिप्पणी के बीच की रेखा जितनी स्पष्ट होगी, सार्वजनिक विमर्श उतना स्वस्थ होगा। किसी संस्था की आलोचना लोकतंत्र-विरोधी नहीं है; बिना प्रमाण किसी संस्था की नीयत पर लगातार संदेह करना भी जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता। आलोचना का अधिकार और तथ्य के प्रति जिम्मेदारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब सार्वजनिक बहस में प्रमाण पीछे और उत्तेजना आगे हो जाती है, तब नुकसान केवल किसी एक संस्था का नहीं होता; नागरिक का निर्णय-विवेक भी प्रभावित होता है।

राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी इससे अलग नहीं है। सत्ता में रहते हुए संस्थाओं की स्वतंत्रता का सम्मान और विपक्ष में रहते हुए उन्हीं संस्थाओं की संवैधानिक भूमिका का सम्मान लोकतांत्रिक परिपक्वता के संकेत हैं। किसी संस्था का निर्णय अनुकूल हो तो उसे निष्पक्ष और प्रतिकूल हो तो पक्षपाती बताने की प्रवृत्ति संस्थाओं से अधिक राजनीतिक संस्कृति को नुकसान पहुँचाती है। संस्थाएँ किसी दल की सुविधा के अनुसार विश्वसनीय नहीं हो सकतीं। उनकी विश्वसनीयता का आधार नियमों की निरंतरता, समान व्यवहार और निर्णयों की सार्वजनिक व्याख्या होना चाहिए।

विश्वास का बड़ा शत्रु केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि असंगति भी है। जब समान परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहार दिखाई देता है, जब नियमों की व्याख्या अवसर के अनुसार बदलती प्रतीत होती है या जब जवाबदेही का स्तर व्यक्ति और पद के अनुसार अलग दिखाई देता है, तब नागरिक के मन में यह प्रश्न जन्म लेता है कि व्यवस्था वास्तव में किसके लिए समान है। इसलिए संस्थागत सुधारों का केंद्र केवल नई समितियाँ, नए कानून या नई तकनीक नहीं होना चाहिए। आवश्यकता ऐसी कार्यसंस्कृति की है जिसमें निर्णय का आधार दर्ज हो, समयसीमा स्पष्ट हो, जिम्मेदारी तय हो और त्रुटि होने पर सुधार की गुंजाइश बनी रहे।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में संस्थाओं का भरोसा एक दिन में निर्मित नहीं हो सकता। गाँव, कस्बे और महानगर में नागरिक का अनुभव अलग हो सकता है, लेकिन उसकी मूल अपेक्षा समान है-न्याय मिले, नियम स्पष्ट हों और उसकी आवाज सुनी जाए। उत्तर प्रदेश के किसी छोटे जिले से लेकर महानगर तक लोकतंत्र की गुणवत्ता को अंततः नागरिक अपने अनुभव से मापता है। संविधान की भाषा जितनी महान है, उसका प्रभाव तभी स्थायी होगा जब वह नागरिक के दैनिक जीवन में समानता, सम्मान और सुरक्षा के रूप में दिखाई दे।

इसलिए संस्थाओं को केवल अधिकार नहीं, आत्मसुधार की क्षमता भी चाहिए। न्यायपालिका में पारदर्शिता, निर्वाचन व्यवस्था में स्पष्ट प्रक्रियाएँ, संसद में गंभीर विमर्श, प्रशासन में समयबद्ध सेवा, सूचना व्यवस्था में तथ्यपरकता और मीडिया में प्रमाण-आधारित पत्रकारिता—ये अलग-अलग सुधार नहीं हैं। ये उसी लोकतांत्रिक विश्वास की अलग-अलग कड़ियाँ हैं। संस्थाओं को आलोचना से बचाने के बजाय उन्हें प्रमाणित आलोचना का सामना करने में सक्षम बनाना चाहिए। जो संस्था प्रश्नों से डरती है, वह धीरे-धीरे जनता से दूर होती है; जो संस्था प्रश्नों का उत्तर देने की क्षमता विकसित करती है, वह अपने अधिकार को अधिक वैध बनाती है।

अंततः लोकतंत्र का भरोसा किसी एक पद, दल या संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। यह नागरिक और संस्थाओं के बीच प्रतिदिन बनने वाला सामाजिक अनुबंध है। इसे भाषणों से नहीं, व्यवहार से बचाया जा सकता है। न्याय का अर्थ केवल निर्णय नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया है; चुनाव का अर्थ केवल मतदान नहीं, विश्वसनीय सहभागिता है; प्रशासन का अर्थ केवल आदेश नहीं, उत्तरदायी सेवा है और लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुमत नहीं, संस्थागत संतुलन भी है। आज आवश्यकता ऐसी राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति की है जिसमें असहमति को शत्रुता न समझा जाए, आलोचना को अपमान न माना जाए और पारदर्शिता को कमजोरी नहीं, शक्ति समझा जाए। लोकतंत्र की सबसे मजबूत दीवार वह नहीं होती जिसे कोई चुनौती न दे सके; सबसे मजबूत दीवार वह होती है जो हर वैध प्रश्न के सामने अपनी नींव और मजबूत कर सके।

(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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