मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई स्वयं से

अवनीश कुमार गुप्ता मनुष्य का वास्तविक संघर्ष बाहरी संसार से कम और अपने अंतर्मन से अधिक होता है। सभ्यताओं का इतिहास इस सत्य का प्रमाण है कि किसी राष्ट्र का उत्थान केवल उसके प्राकृतिक संसाधनों, आर्थिक समृद्धि अथवा वैज्ञानिक उपलब्धियों से सुनिश्चित नहीं होता, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना, नैतिक मूल्यों और विचारों की गुणवत्ता ही उसके भविष्य का निर्धारण करती है। जब किसी समाज में सत्य की अपेक्षा सुविधा, विवेक की अपेक्षा अंधानुकरण और उत्तरदायित्व की अपेक्षा स्वार्थ को अधिक महत्त्व मिलने लगता है, तब पतन का आरंभ दिखाई दिए बिना ही हो जाता है। सामाजिक अव्यवस्थाएँ अचानक जन्म नहीं लेतीं; वे वर्षों तक व्यक्ति

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