
समानता व विविधता के बीच संतुलन
अवनीश कुमार गुप्ता कानून किसी समाज की केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं होता, बल्कि वह उसकी सामाजिक चेतना, न्याय-बोध और बदलती परिस्थितियों का दर्पण भी होता है। मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में विवाह, परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे विषय मुख्यतः परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय रीति-रिवाजों से संचालित होते थे। जैसे-जैसे राज्य संगठित हुए और नागरिक जीवन जटिल होता गया, इन बिखरे नियमों को लिखित और व्यवस्थित रूप देने की आवश्यकता महसूस हुई। नागरिक संहिताओं का विकास इसी दीर्घ यात्रा का परिणाम है। प्राचीन विधि-व्यवस्थाओं से लेकर रोमन विधि और यूरोपीय संहिताकरण तक कानून निरंतर बदलता रहा। 1804 की नेपोलियन संहिता इस यात्रा का महत्वपूर्ण
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कांग्रेस की दस गारंटियों को चार साल पूरे, अब गारंटियों का नाम लेने से भी डर रही सरकार : जयराम ठाकुर
शिमला : पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि आज कांग्रेस की उन दस गारंटियों को चार साल पूरे हो गए हैं,


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Government to consider starting Karmakand Purohit courses in state- run Sanskrit colleges : Sukhu
Shimla : Chief Minister Thakur Sukhvinder Singh Sukhu while chairing a meeting of the Himachal Pradesh Brahmin Welfare Board here today said that the state
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