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वोटों की खेती, वादों का पानी

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–अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद’

वोटों की खेती में, वादों का पानी डाला जाता है,
हर मौसम में सच का बीज, चुपचाप जला दिया जाता है।
चुनाव आते ही भाषणों का सूरज उग जाता है,
फिर पांच साल तक अंधेरा ही घर कर जाता है।

नेताओं की मुस्कान में, गणित बड़ा गहरा होता है,
जनता का दुख बस भाषणों में ही ठहरा होता है।
कुर्सी की पूजा में, सिद्धांत रोज़ बदल जाते हैं,
सच की राह पर चलने वाले, अक्सर कुचल जाते हैं।

फाइलों के जंगल में, न्याय कहीं खो जाता है,
एक हस्ताक्षर के लिए, समय भी रो जाता है।
कानून की भाषा में, शब्द बहुत भारी हैं,
पर आम आदमी के लिए, दरवाज़े ही बंद सारी हैं।

विकास के नाम पर, आंकड़ों का खेल सजाया है,
हकीकत की तस्वीर को, पर्दों में छुपाया है।
सड़कें बनती कागज़ पर, सपने टीवी पर चलते हैं,
जमीन पर सच के पांव, अक्सर ही फिसलते हैं।

भ्रष्टाचार की नदी में, ईमान बहाया जाता है,
जो सवाल करे, उसे ही दोषी बताया जाता है।
देशभक्ति का शोर यहां, जरूरत पर बढ़ जाता है,
मुद्दों से ध्यान हटाकर, हर सवाल दब जाता है।

जनता फिर भी आशा में, कतारों में खड़ी रहती है,
हर बार नए वादों की, चादर ओढ़े रहती है।
मिट्टी सब याद रखती है, हिसाब एक दिन होगा,
व्यवस्था के आईने में, सच साफ़ दिखेगा।

(कवि साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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