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पुरुषों की तुलना में तेजी से बढ़ती महिला कैदी; बदलते समाज, कानून और अपराध की नई तस्वीर

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कांतिलाल मांडोत

भारतीय जेलों में महिला कैदियों की संख्या में आई तेज़ी से बढ़ोतरी केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, कानून व्यवस्था और सामाजिक संरचना में आए गहरे बदलावों का संकेत है। हाल में जारी इंस्टीट्यूट फॉर क्राइम एंड जस्टिस पॉलिसी रिसर्च (आईसीपीआर) की रिपोर्ट वर्ल्ड फीमेल इम्प्रिजनमेंट लिस्ट बताती है कि पिछले दो दशकों में भारतीय जेलों में महिलाओं की संख्या पुरुषों और सामान्य जनसंख्या की तुलना में दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। वर्ष 2000 में जहां महिला कैदियों की संख्या 9,089 थी, वहीं 2022 तक यह बढ़कर 23,772 हो गई। यह 162 प्रतिशत की वृद्धि है, जबकि इसी अवधि में पुरुष कैदियों की संख्या 77 प्रतिशत बढ़ी और देश की कुल आबादी में लगभग 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। क्या महिलाएं पहले की तुलना में ज्यादा अपराध करने लगी हैं, या फिर कानून और समाज की नजर महिलाओं पर पहले से अधिक सख्त हो गई है। क्या यह बदलाव महिलाओं की बढ़ती स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी का अनचाहा परिणाम है, या फिर सामाजिक-आर्थिक दबावों का असर है। इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है, क्योंकि महिला अपराध और महिला कैदियों की बढ़ती संख्या समाज के स्वास्थ्य का आईना होती है।
स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में भारतीय समाज की संरचना अपेक्षाकृत पारंपरिक थी। महिलाओं की भूमिका मुख्य रूप से घर-परिवार तक सीमित मानी जाती थी। शिक्षा और रोजगार में उनकी भागीदारी सीमित थी और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी कम दिखाई देती थी। उस दौर में महिला अपराध की घटनाएं कम थीं और जो मामले सामने आते भी थे, वे अधिकतर घरेलू विवाद, पारिवारिक झगड़े या परिस्थितिजन्य अपराधों से जुड़े होते थे। समाज और कानून दोनों ही महिलाओं को अपराधी के रूप में देखने से कतराते थे। यह धारणा प्रचलित थी कि महिला अपराध स्वभाव से नहीं, बल्कि मजबूरी या किसी पुरुष के प्रभाव में होता है।
न्यायिक व्यवस्था में भी महिलाओं के प्रति एक प्रकार की नरमी देखने को मिलती थी। जमानत, सजा और विचाराधीन मामलों में महिलाओं को अक्सर राहत मिल जाती थी। सामाजिक सोच यह मानती थी कि महिला को सुधार की जरूरत है, न कि कठोर दंड की। यही वजह थी कि महिला कैदियों की संख्या लंबे समय तक सीमित रही।
लेकिन इक्कीसवीं सदी के साथ भारत तेजी से बदला। शहरीकरण, औद्योगीकरण और वैश्वीकरण ने सामाजिक ढांचे को नई दिशा दी। महिलाएं शिक्षा, रोजगार, व्यापार और राजनीति में आगे बढ़ीं। उन्होंने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियां संभालीं। यह बदलाव सकारात्मक था और आज की महिला पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनी। लेकिन इसी बदलाव के साथ अपराध की दुनिया का स्वरूप भी बदला और महिलाओं की भूमिका उसमें बढ़ने लगी।
आईसीपीआर रिपोर्ट के अनुसार, आज महिलाएं संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, आर्थिक अपराध और साइबर अपराध जैसे मामलों में अधिक संख्या में सामने आ रही हैं। यह बदलाव दर्शाता है कि अपराध अब केवल हाशिए पर खड़े लोगों की मजबूरी नहीं रहा, बल्कि एक संगठित और नेटवर्क आधारित गतिविधि बन चुका है। इन नेटवर्कों में महिलाओं को कम संदेहास्पद मानकर इस्तेमाल किया जाता है, जिससे वे अपराध के जाल में फंस जाती हैं।
इसके साथ ही न्यायिक रुझान में भी बड़ा बदलाव आया है। कानून के सामने समानता के सिद्धांत को अधिक सख्ती से लागू किया जा रहा है। अब महिला और पुरुष अपराधियों के बीच भेदभाव कम हुआ है। जहां पहले महिला होने के कारण राहत मिल जाती थी, वहीं अब अपराध की प्रकृति के आधार पर सजा तय की जा रही है। यह समानता जरूरी है, लेकिन इसका असर आंकड़ों में महिला कैदियों की संख्या बढ़ने के रूप में भी दिख रहा है।
महिला अपराध के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण काम कर रहे हैं। तेजी से बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और असमान विकास ने समाज के कमजोर वर्गों पर दबाव बढ़ाया है। महिलाएं, खासकर शहरी झुग्गियों और ग्रामीण इलाकों की महिलाएं, आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं। रोजगार के सीमित अवसर और कम आय उन्हें अवैध गतिविधियों की ओर धकेल देते हैं। कई मामलों में महिलाएं अपराध की मुख्य योजनाकार नहीं होतीं, बल्कि किसी बड़े गिरोह का हिस्सा बन जाती हैं।
पारिवारिक और सामाजिक टूटन भी एक बड़ा कारण है। संयुक्त परिवारों का विघटन, घरेलू हिंसा, तलाक और अकेलेपन ने महिलाओं को मानसिक रूप से कमजोर किया है। कई महिलाएं अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए गलत रास्ते चुन लेती हैं। इसके अलावा शिक्षा और कानूनी जागरूकता की कमी भी महिला अपराध को बढ़ावा देती है। कई बार महिलाएं यह समझ ही नहीं पातीं कि वे जिस गतिविधि में शामिल हैं, वह गंभीर अपराध की श्रेणी में आती है।
हाल के वर्षों में बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ सघन अभियानों के कारण भी महिला कैदियों की संख्या बढ़ी है। अनुमान के अनुसार, केवल पश्चिम बंगाल की जेलों में 358 बांग्लादेशी महिलाएं कैद हैं। यह स्थिति सीमा सुरक्षा, अवैध प्रवासन और मानव तस्करी जैसे मुद्दों को भी उजागर करती है। इन महिलाओं में से कई तस्करी का शिकार होती हैं, लेकिन कानून की नजर में वे अपराधी बन जाती हैं।
महिला कैदियों की बढ़ती संख्या ने जेल प्रशासन के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पुरुष प्रधान जेल व्यवस्था महिलाओं की विशेष जरूरतों को पूरा करने में अभी भी पीछे है। गर्भवती महिला कैदियों, बच्चों के साथ रहने वाली महिलाओं, मानसिक स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले रही हैं। जेलों में पुनर्वास और सुधार की व्यवस्था कमजोर होने के कारण कई महिलाएं जेल से बाहर आने के बाद फिर से अपराध की दुनिया में लौट जाती हैं।
इस समस्या का समाधान केवल सख्त कानून या ज्यादा जेलें बनाकर नहीं निकाला जा सकता। महिला अपराध को समझने के लिए हमें समाज की जड़ों तक जाना होगा। महिलाओं के लिए स्थायी रोजगार, कौशल विकास और आर्थिक सशक्तिकरण बेहद जरूरी है। जब महिलाओं के पास सम्मानजनक आजीविका के साधन होंगे, तो वे अपराध की ओर कम आकर्षित होंगी। इसके साथ ही कानूनी जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि महिलाएं अनजाने में अपराध का हिस्सा न बनें।
संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी में महिलाओं का इस्तेमाल करने वाले गिरोहों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। महिलाओं को मोहरे की तरह इस्तेमाल करने वालों को कानून का कड़ा संदेश मिलना जरूरी है। जेलों में भी सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श के जरिए महिला कैदियों को समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर देना होगा।
आज की महिला पहले की महिला से अलग है। वह अधिक शिक्षित, अधिक स्वतंत्र और अधिक मुखर है। लेकिन यह बदलाव तभी सार्थक होगा, जब समाज और व्यवस्था उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चले। महिला कैदियों की बढ़ती संख्या हमें चेतावनी देती है कि विकास के साथ-साथ सुरक्षा और संवेदनशीलता भी जरूरी है। अगर हम इस चुनौती को समय रहते नहीं समझे, तो यह समस्या और गहरी होती जाएगी।
अंततः महिला अपराध और महिला कैदियों की बढ़ती संख्या को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के संकेत के रूप में देखना होगा। दंड से पहले समझ और जेल से पहले समाधान की सोच अपनानी होगी। तभी समाज सच मायनों में प्रगतिशील और न्यायपूर्ण बनेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और साहित्यकार हैं)

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Author: speedpostnews

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