पड्डल मैदान में उस दिन जनसमूह की संख्या ही नहीं, मनोदशा भी बदली हुई थी। मंच के सामने बैठी अपेक्षा से कहीं अधिक भीड़ के बीच, मंच के केंद्र में खड़े मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का हर शब्द धीरे-धीरे एक राजनीतिक वक्तव्य से आगे बढ़कर विश्वास की घोषणा बनता चला गया। यह भाषण न तो केवल सरकार की उपलब्धियों की सूची था और न ही विपक्ष पर सीधा प्रहार—यह उस नेतृत्व का आत्मविश्वासी संकेत था, जो संकट के दौर में जनता को साथ लेकर चलने का दावा करता है। जनसंकल्प सम्मेलन में मंच से बोला गया हर वाक्य जनमानस के भीतर उतरता दिखा।
इस बदलाव की सबसे जीवंत तस्वीर मंच के सामने ही दिखी। भाषण से पहले एक लाइव चैनल पर निराश और हताश दिख रहीं इक्का-दुक्का महिलाएं, भाषण के बाद आत्मविश्वास और उम्मीद से भरी नजर आईं। पड्डल में उस दिन जनसंकल्प केवल नारा नहीं रहा, वह लोगों के भीतर उतर गया। मंच के केंद्र से उभरा नेतृत्व बाकी शोर से अलग, सबसे स्पष्ट और सबसे ऊँचा सुनाई दिया। भाषण के दौरान ही कुछ कार्यकर्ताओं की फुसफुसाहट माहौल को बयान कर रही थी—“हिमाचल को आज नेता मिल गया है।”
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत ही उस अंधेरे से की, जो उन्हें सत्ता संभालते वक्त विरासत में मिला था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने प्रदेश की बागडोर संभाली, तब चारों ओर निराशा और हताशा का माहौल था। पूर्ववर्ती सरकारों ने कर्ज़ लेने की नीति को शासन का विकल्प बना लिया, लेकिन जिम्मेदारी निभाने की इच्छाशक्ति कहीं नजर नहीं आई। नतीजतन, उन्हें विरासत में 70 हजार करोड़ रुपये का कर्ज़, 10 हजार करोड़ रुपये की देनदारियां, घाटे में डूबे दर्जनों बोर्ड-निगम, बेरोजगारों की लंबी कतार और किसानों-बागवानों के लिए उत्पादों की अव्यवस्थित खरीद-बिक्री व्यवस्था मिली।
सुक्खू ने कर्ज़ के सवाल पर विपक्ष को सीधे शब्दों में घेरा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पूर्व सरकारों द्वारा लिए गए कर्ज़ को चुकाने के लिए कर्ज़ ले रही है, लेकिन वही लोग शोर मचा रहे हैं कि यह सरकार कर्ज़ में प्रदेश को डुबो रही है। यह फर्क उन्होंने मंच से नहीं, तथ्यों से समझाने की कोशिश की।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि भयावह परिस्थितियों ने उनकी सरकार को हतोत्साहित नहीं किया। इसके उलट, इन्हीं हालातों से निकलने के लिए एक बृहद कार्ययोजना तैयार की गई। कांग्रेस के घोषणा पत्र में किए गए वादों को पहले दिन से लागू करने की बात करते हुए उन्होंने कर्मचारियों के लिए ओपीएस लागू करने का उल्लेख किया। साथ ही यह भी रेखांकित किया कि संसाधन बढ़ाने के लिए शराब के ठेकों की नीलामी में चली आ रही भ्रष्ट नीति को बदला गया, जिससे एक ही वर्ष में 450 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व अर्जित हुआ—इतनी कमाई पूर्व भाजपा सरकार चार वर्षों में कर पाई थी।
रोजगार के सवाल पर सुक्खू ने कहा कि शिक्षित और प्रशिक्षित बेरोजगारों को सम्मानजनक आजीविका देने के लिए राजीव गांधी स्वराज स्वरोजगार योजना के तहत 680 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। ई-टैक्सी, सोलर परियोजनाओं जैसी योजनाओं में भारी अनुदान देकर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया गया, जिसके परिणाम अब जमीन पर दिख रहे हैं।
किसानों और बागवानों के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने केवल योजनाएं नहीं बनाईं, बल्कि बाजार तक पहुंच सुनिश्चित की। मक्का, गेहूं, जौ और हल्दी पर एमएसपी, बागवानों के लिए यूनिवर्सल कार्टन योजना और आढ़तियों की पकड़ से मुक्ति—इन फैसलों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दी। पशुपालकों के लिए गाय के दूध का 51 रुपये और भैंस के दूध का 61 रुपये प्रति किलो मूल्य तय कर देश के सामने एक मॉडल रखा गया। गोबर खरीद योजना के तहत सरकार द्वारा तीन रुपये प्रति किलो की दर से गोबर खरीदने की पहल ने गांवों में अतिरिक्त आय के नए रास्ते खोले।
आय के स्रोत बढ़ाने के लिए सुक्खू सरकार ने एक और राजनीतिक रूप से साहसिक फैसला लिया—साधन-संपन्न वर्ग को बिजली, राशन और अन्य सब्सिडी योजनाओं से बाहर किया गया। साथ ही, पूर्व सरकार द्वारा सरकारी संपत्तियों और संसाधनों को कौड़ियों के दाम देने की नीति को बदला गया। अदालतों में गंभीरता से केस लड़े गए और हजारों करोड़ रुपये सरकारी खजाने तक वापस लाए गए।
आपदा राहत के सवाल पर मुख्यमंत्री ने केंद्र की सीमित मदद का उल्लेख करते हुए कहा कि दो बड़ी आपदाओं के बावजूद केंद्र से अब तक केवल 451 करोड़ रुपये मिले। इसके बावजूद राज्य सरकार ने आर्थिक बंदिशों के बीच आपदा पीड़ितों को सम्मानजनक राहत पैकेज दिया, जिसकी सराहना वर्ल्ड बैंक से लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार तक कर चुके हैं।
भाषण के अंत में मुख्यमंत्री ने बिना नाम लिए नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की ‘ऑटो’ वाली टिप्पणी पर सधा हुआ प्रहार किया। उन्होंने कहा कि 2022 में कुछ लोग दावा कर रहे थे कि वे 52 सीटें जीतकर वोल्वो में बैठकर विधानसभा आएंगे। यह व्यंग्य तालियों में दब गया, लेकिन संदेश साफ था—हिमाचल की सियासत अब दावों से नहीं, फैसलों और परिणामों से तय होगी।
पड्डल मैदान में उस दिन भाषण खत्म हुआ, लेकिन संकेत छोड़ गया कि हिमाचल की राजनीति में जनता अब शब्दों से नहीं, भरोसे से चलने वाले नेतृत्व को परख रही है।



