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स्याही की उंगली, अनकहे सवाल

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–अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद’
चुनाव का मौसम आया, गलियों में शोर उठा,
हर दीवार पर चेहरा नया, हर वादा फिर से सजा।
भाषणों की बारिश में, सच कहीं बह जाता है,
हर मंच पर सपना नया, ज़मीन पर खो जाता है।

मतदाता की उंगली पर स्याही का गर्व दिखता है,
पर दिल के अंदर कई सवाल चुपचाप सिसकता है।
भीड़ में हर चेहरा जैसे उम्मीदों से भरा है,
पर हर उम्मीद का जवाब अभी अधूरा पड़ा है।

नेताओं की रैलियों में आँकड़ों का खेल चलता है,
सच और झूठ के बीच फर्क धुंधला सा लगता है।
विकास के दावे ऊँचे, हकीकत छोटी रह जाती,
टीवी की बहसों में बस आवाज़ें ही टकराती।

कहीं धर्म का नारा है, कहीं जाति का सहारा,
मुद्दों की भीड़ में खो जाता असली गुज़ारा।
रोटी, नौकरी, शिक्षा—पीछे छूट जाते हैं,
चमकते नारों के आगे, सवाल झुक जाते हैं।

फिर भी जनता हर बार लाइन में खड़ी रहती है,
लोकतंत्र की आस लिए, चुपचाप बढ़ी रहती है।
मिट्टी सब याद रखती है, हर वादा, हर सवाल,
एक दिन सच बोल उठेगा—यही है असली कमाल।

(कवि साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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