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उत्सव, प्रशासन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता : एक जरूरी प्रश्न

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साहिल शर्मा
हिमाचल प्रदेश की पहचान शांति, सांस्कृतिक गरिमा और सामाजिक सौहार्द से जुड़ी रही है। यहां के मेले और त्योहार केवल मनोरंजन के अवसर नहीं होते, बल्कि वे समाज की सामूहिक चेतना और परंपराओं के जीवंत प्रतीक होते हैं। विशेषकर सुजानपुर का राज्य स्तरीय होली मेला ऐतिहासिक विरासत, जनसहभागिता और सांस्कृतिक गौरव का संगम है। ऐसे आयोजनों में हजारों लोग केवल कार्यक्रम देखने नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बनने के लिए आते हैं। इसलिए इन मंचों से जाने वाला हर दृश्य और हर संदेश व्यापक महत्व रखता है।
हाल की एक सांस्कृतिक संध्या में लोकप्रिय पंजाबी गायक Mankirt Aulakh ने प्रस्तुति दी। स्वाभाविक रूप से भारी भीड़ उमड़ी और युवाओं में विशेष उत्साह देखा गया। कार्यक्रम में अनेक गीत प्रस्तुत किए गए और अधिकांश प्रस्तुति उत्सव की सामान्य ऊर्जा का हिस्सा रही। किंतु चर्चा का केंद्र एक विशेष क्षण बन गया।
एक ऐसे गीत की प्रस्तुति के दौरान, जिसे सामान्यतः ‘गन-कल्चर’ अर्थात हथियार संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है, हमीरपुर के उपायुक्त (DC), पुलिस अधीक्षक (SP), अतिरिक्त उपायुक्त (ADC) तथा सुजानपुर के विधायक मंच के समीप नृत्य करते हुए दिखाई दिए। यह दृश्य कई लोगों के लिए सामान्य उत्सवधर्मिता का प्रतीक रहा होगा। किसी भी राज्य स्तरीय आयोजन में प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति स्वाभाविक है, और कई बार वे औपचारिकता से बाहर निकलकर जनता के साथ आनंद भी साझा करते हैं।
यह भी संभव है कि उस क्षण में किसी प्रकार की अनुचित मंशा न रही हो। उत्सव का वातावरण स्वाभाविक रूप से लोगों को सहभागी बनने के लिए प्रेरित करता है। सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति भी कभी-कभी उस ऊर्जा का हिस्सा बन जाते हैं। इसलिए इस प्रसंग को व्यक्तिगत आलोचना के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
फिर भी, यहाँ प्रश्न मंशा का नहीं, बल्कि संदेश और प्रतीकात्मक प्रभाव का है। प्रशासनिक पद केवल व्यक्तिगत पहचान नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वास के प्रतीक होते हैं। जिला उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक जैसे पद कानून-व्यवस्था, संतुलन और अनुशासन का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब ऐसे पदों से जुड़े अधिकारी किसी विशेष दृश्य में दिखाई देते हैं, तो वह दृश्य स्वाभाविक रूप से एक सार्वजनिक संदेश का रूप ले लेता है-चाहे वह संदेश देने का उद्देश्य रहा हो या नहीं।
आज के समय में सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के कारण किसी भी कार्यक्रम का एक छोटा-सा अंश व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है। विशेषकर युवा वर्ग संगीत और मंचीय प्रस्तुतियों से गहराई से प्रभावित होता है। गीतों के शब्द, प्रतीक और प्रस्तुति कई बार केवल मनोरंजन नहीं रहते, बल्कि एक छवि या जीवनशैली का संकेत बन जाते हैं। जब हथियारों या शक्ति-प्रदर्शन को आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका सांकेतिक प्रभाव पड़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश अपेक्षाकृत शांत सामाजिक वातावरण के लिए जाना जाता है। यहाँ सामुदायिक संबंध मजबूत रहे हैं और कानून-व्यवस्था संतुलित रही है। ऐसे प्रदेश में यदि सार्वजनिक मंचों से ऐसे प्रतीक उभरें जो ‘गन-संस्कृति’ से जुड़े माने जाते हैं, तो स्वाभाविक है कि कुछ नागरिक संवेदनशीलता की अपेक्षा करें। यह अपेक्षा किसी कलाकार के विरुद्ध नहीं, बल्कि आयोजन की प्रकृति और संदेश से जुड़ी है।
यह प्रसंग हमें यह सोचने का अवसर देता है कि राज्य स्तरीय आयोजनों की रूपरेखा किन मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। क्या केवल लोकप्रियता और भीड़ आकर्षण ही प्राथमिकता हो, या सामाजिक प्रभाव को भी महत्व दिया जाए? क्या सांस्कृतिक मंचों का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, या वे सकारात्मक मूल्यों के संवाहक भी हैं?
होली का पर्व प्रेम, रंग और समरसता का प्रतीक है। यदि इसी भावना को केंद्र में रखकर कार्यक्रमों की रूपरेखा बने तो विवाद की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। आधुनिकता और परंपरा का संतुलन आवश्यक है, परंतु उस संतुलन में सामाजिक जिम्मेदारी भी शामिल होनी चाहिए। लोकप्रिय कलाकारों को आमंत्रित करना गलत नहीं है, किंतु प्रस्तुति के चयन में संवेदनशीलता अपेक्षित है।
लोकतंत्र में नागरिकों का यह अधिकार है कि वे सार्वजनिक घटनाओं पर विचार रखें। यह विमर्श आरोप नहीं, बल्कि जागरूकता का संकेत है। यदि किसी दृश्य से समाज के एक वर्ग को असहजता हुई है, तो उसे संवाद का अवसर माना जाना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहाँ प्रश्न पूछे जा सकते हैं और उन्हें सम्मानपूर्वक सुना भी जाता है।
अंततः यह मुद्दा किसी व्यक्ति या एक क्षण से बड़ा है। यह प्रश्न है सांस्कृतिक मंचों की दिशा का, प्रशासनिक गरिमा के संतुलन का और युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का। यदि इस प्रसंग से भविष्य में आयोजनों की योजना और अधिक संवेदनशील बनती है, तो यही इसका सकारात्मक परिणाम होगा।
उत्सव तभी सार्थक हैं जब वे समाज को जोड़ें, सकारात्मक ऊर्जा दें और सांस्कृतिक विरासत को सशक्त करें। आवश्यकता आरोप की नहीं, बल्कि सजगता की है।

(ग्राम बाहल अर्जुन, डाकघर चकमोह, तहसील धटवाल, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश – 176039
मो : 85447 05033)

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Author: speedpostnews

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