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हमेशा वही क्यों गिरता है?

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-साहिल शर्मा

अजीब बात है…
कभी बड़े दफ्तरों की दीवारें नहीं गिरतीं,
कभी ऊँची कुर्सियों के कमरे नहीं टूटते।

पर गिरता क्या है?
स्कूल गिरते हैं…
जहाँ सपने पढ़ते हैं।
अस्पताल गिरते हैं…
जहाँ ज़िंदगी बचती है।
पुल गिरते हैं…
जहाँ भरोसा चलता है।
सड़कें टूटती हैं…
जहाँ रोज़मर्रा की जिंदगी गुजरती है।

ऐसा क्यों है?
क्या वहाँ की ईंटें कमजोर होती हैं?
या यहाँ जिम्मेदारियाँ ढीली पड़ जाती हैं?

क्यों हर बार
मलबे के नीचे
उम्मीद दबती है…
और ऊपर खड़े लोग
सिर्फ बयान देते हैं?

जहाँ ताकत है,
वहाँ मरम्मत पहले हो जाती है…
जहाँ ज़रूरत है,
वहाँ इंतज़ार ही चलता रहता है।

कुछ इमारतें गिरने से पहले ही
नई बन जाती हैं,
और कुछ…
गिरने के बाद भी
बस खबर बनकर रह जाती हैं।

क्यों हर बार हादसा जरूरी होता है?
क्यों हर बार जान जाने के बाद ही
सिस्टम जागता है?

क्या पहले से संभालना मुश्किल है…
या बाद में दिखावा आसान?

शायद सच्चाई ये है—
यहाँ गिरती दीवारें नहीं…
गिरता है भरोसा…
और हर बार
वही जगह गिरती है
जहाँ आम आदमी खड़ा होता है।

(युवा कवि बड़सर, हमीरपुर के रहने वाले हैं)

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