कांतिलाल मांडोत
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि भारतीय समाज की उस चुप्पी को तोड़ने वाला क्षण है, जिसने दशकों तक मासिक धर्म को हाशिए पर रखा। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। इस फैसले के साथ ही स्कूलों में पढ़ने वाली लाखों छात्राओं के लिए स्वच्छता, सम्मान और समान अवसर की राह मजबूत हुई है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यह फैसला एक जनहित याचिका पर सुनाते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि देश के हर सरकारी और निजी स्कूल में छात्राओं को मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। अदालत ने यह भी अनिवार्य किया कि स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय हों, जिनमें पर्याप्त पानी, साबुन, हैंडवॉश और निजी इस्तेमाल की सुविधा मौजूद हो। यदि कोई निजी स्कूल इन मानकों का पालन नहीं करता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है, जबकि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कमी की सीधी जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होगी।
कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि मासिक धर्म के दौरान बुनियादी सुविधाओं की कमी केवल असुविधा नहीं, बल्कि छात्राओं की गरिमा, निजता और शिक्षा के अधिकार पर सीधा आघात है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। लड़कियों को सैनिटरी पैड जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित रखना उन्हें लड़कों के समान शिक्षा और गतिविधियों में भाग लेने से रोकता है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
इस मामले की पृष्ठभूमि भी उतनी ही गंभीर है। सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर ने वर्ष 2022 में यह जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें बताया गया था कि आर्थिक तंगी और सामाजिक झिझक के कारण बड़ी संख्या में किशोरियां मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं जा पातीं। कई परिवारों के लिए सैनिटरी पैड पर खर्च करना बोझ बन जाता है, नतीजतन लड़कियां कपड़े या असुरक्षित विकल्पों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे संक्रमण और आत्मसम्मान दोनों पर असर पड़ता है। कोर्ट में करीब चार साल चली सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि उत्तर भारत में लगभग 29 प्रतिशत छात्राएं मासिक धर्म के दिनों में स्कूल नहीं जातीं, और यही अनुपस्थिति आगे चलकर पढ़ाई छूटने और स्कूल छोड़ने की बड़ी वजह बनती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सिर्फ पैड उपलब्ध कराने तक बात सीमित नहीं रखी। अदालत ने कहा कि हर स्कूल में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर बनाए जाएं, जहां अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध हों, ताकि किसी भी आपात स्थिति में छात्रा को स्कूल छोड़कर घर न जाना पड़े। टॉयलेट परिसरों में या तय स्थानों पर वेंडिंग मशीन के माध्यम से सैनिटरी पैड आसानी से उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया है। साथ ही दिव्यांग छात्राओं के लिए अनुकूल शौचालय व्यवस्था सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया है।
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कोर्ट ने मासिक धर्म को लेकर सामाजिक संवेदनशीलता विकसित करने की जरूरत पर बल दिया। अदालत ने कहा कि यह आदेश केवल कानूनी तंत्र के लिए नहीं है, बल्कि उन लड़कियों के लिए है जो मदद मांगने से झिझकती हैं, उन शिक्षकों के लिए है जो सहयोग करना चाहते हैं लेकिन सामाजिक चुप्पी के कारण बंधे रहते हैं, और उन माता-पिता के लिए है जो इस विषय पर खामोशी चुन लेते हैं। कोर्ट ने भावनात्मक शब्दों में कहा कि हर उस लड़की को यह संदेश मिलना चाहिए कि मासिक धर्म कोई अशुद्धता या बोझ नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, और इसके कारण शिक्षा से दूर किया जाना किसी भी हालत में जायज नहीं है।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में मासिक धर्म, किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलावों तथा स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को शामिल किया जाए। शिक्षकों, छात्राओं और स्कूल स्टाफ को मासिक धर्म स्वच्छता पर प्रशिक्षण देने की बात कही गई है, ताकि गलत धारणाओं और शर्म की भावना को खत्म किया जा सके। कोर्ट का मानना है कि जब तक जानकारी और संवाद को सामान्य नहीं बनाया जाएगा, तब तक केवल ढांचागत सुविधाएं भी अधूरी साबित होंगी।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देश के कई राज्यों ने अपने स्तर पर मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर पहल की है। ओडिशा ने 2018 में ‘खुशी योजना’ शुरू कर सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड देना शुरू किया था। मध्य प्रदेश ने कैश ट्रांसफर मॉडल अपनाते हुए सातवीं से बारहवीं तक की छात्राओं के खातों में सालाना राशि डालने की व्यवस्था की। राजस्थान में ‘उड़ान योजना’ के तहत स्कूल, कॉलेज और आंगनबाड़ी स्तर पर मुफ्त नैपकिन बांटे जाते हैं। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी अलग-अलग योजनाओं और वेंडिंग मशीनों के जरिए छात्राओं तक ये सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद इन पहलों को राष्ट्रीय स्तर पर एक समान कानूनी आधार मिल गया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह स्वयं इन निर्देशों के पालन की निगरानी करेगा और तीन महीने बाद इस मामले में फिर सुनवाई होगी। इसका मतलब है कि यह फैसला केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके क्रियान्वयन पर भी नजर रखी जाएगी। निजी स्कूलों के लिए यह चेतावनी है कि शिक्षा केवल फीस और इमारतों तक सीमित नहीं, बल्कि छात्राओं की गरिमा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी उनका दायित्व है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय शिक्षा व्यवस्था और समाज दोनों के लिए एक मील का पत्थर है। यह पहली बार है जब मासिक धर्म स्वास्थ्य को इतने स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के दायरे में रखा गया है। यह आदेश न सिर्फ स्कूलों की दीवारों के भीतर बदलाव लाएगा, बल्कि घरों और समाज में भी बातचीत की दिशा बदलेगा। जब अदालत कहती है कि मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधा मिलना जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा है, तो वह दरअसल यह याद दिलाती है कि समानता केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के अनुभवों में महसूस होनी चाहिए। यही इस फैसले की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और साहित्यकार हैं)
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला मासिक धर्म स्वच्छता, अब गरिमा और जीवन के अधिकार का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला मासिक धर्म स्वच्छता, अब गरिमा और जीवन के अधिकार का हिस्सा
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