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भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लौटानी होगी मानवीय संवेदना

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अवनीश कुमार गुप्ता
भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ऐसी दोहरी चुनौती का सामना कर रही है, जिसमें एक ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिभाशाली युवाओं का निर्माण करने की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर प्रवेश परीक्षाओं, कोचिंग उद्योग और अंकों की अंधी प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के मूल उद्देश्य को सीमित कर दिया है। हाल के वर्षों में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं, मानसिक तनाव, छात्र आत्महत्याओं और महंगी कोचिंग व्यवस्था ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संपूर्ण शैक्षिक दर्शन पर पुनर्विचार आवश्यक है। यह तथ्य है कि भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रशासन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में विश्वस्तरीय प्रतिभाएँ दी हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इन सफलताओं के पीछे लाखों ऐसे विद्यार्थी भी हैं जो संसाधनों की कमी, असमान अवसरों और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण अपनी वास्तविक क्षमता तक पहुँच ही नहीं पाते। इसलिए अब शिक्षा को केवल चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता के विकास की प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है।

यह मान लेना कि तीन या चार घंटे की एक परीक्षा किसी विद्यार्थी की बुद्धिमत्ता, रचनात्मकता, नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और जीवन कौशल का अंतिम प्रमाण बन सकती है, आधुनिक शिक्षा विज्ञान की दृष्टि से भी सीमित सोच है। परीक्षा आवश्यक है, किंतु उसे शिक्षा का पर्याय बना देना सबसे बड़ी भूल रही है। आज अनेक विद्यार्थी विश्लेषणात्मक सोच, नवाचार, कला, खेल, सामाजिक नेतृत्व, संवाद कौशल और व्यावहारिक दक्षताओं में उत्कृष्ट होते हुए भी केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे एक विशेष प्रकार की प्रतियोगी परीक्षा के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं पाते। दूसरी ओर रटने की संस्कृति और अनुमान आधारित तैयारी को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था कई बार वास्तविक प्रतिभा की अपेक्षा परीक्षा तकनीक में दक्ष विद्यार्थियों को आगे ले आती है। तथ्य और मत के बीच अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है। तथ्य यह है कि अधिकांश प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश अभी भी प्रतियोगी परीक्षाओं पर आधारित है। मत यह है कि भविष्य में इन परीक्षाओं के साथ बहुआयामी मूल्यांकन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि चयन अधिक न्यायपूर्ण बन सके।

कोचिंग उद्योग का विस्तार भी इसी असंतुलित व्यवस्था का परिणाम है। जब विद्यालयों की शिक्षा प्रवेश परीक्षाओं की आवश्यकताओं से अलग दिखाई देने लगती है, तब अभिभावक अतिरिक्त संसाधनों की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा एक सामाजिक अधिकार से अधिक आर्थिक क्षमता का विषय बन जाती है। छोटे नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक परिवार अपने बच्चों की तैयारी के लिए ऋण लेते हैं, बचत समाप्त कर देते हैं अथवा अन्य आवश्यकताओं में कटौती करते हैं। महानगरों के अतिरिक्त कोटा, प्रयागराज, पटना, सीकर, हैदराबाद, दिल्ली और अन्य शिक्षा केंद्रों में विकसित कोचिंग संस्कृति ने अवसर तो दिए हैं, किंतु साथ ही मानसिक दबाव और सामाजिक असमानता को भी बढ़ाया है। यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक कोचिंग संस्थान नकारात्मक भूमिका निभाता है, क्योंकि अनेक संस्थान गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराते हैं। किंतु जब किसी व्यवस्था की सफलता विद्यालयों से अधिक कोचिंग संस्थानों पर निर्भर होने लगे, तब यह शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर संकेत माना जाना चाहिए।

विद्यालयों की भूमिका को पुनर्स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि विद्यालयों में प्रयोगशाला आधारित शिक्षण, परियोजना कार्य, भाषा दक्षता, तार्किक चिंतन, अनुसंधान प्रवृत्ति, कला, खेल, सामुदायिक सेवा और डिजिटल साक्षरता को समान महत्व दिया जाए तो विद्यार्थियों का समग्र विकास संभव होगा। प्रवेश प्रक्रिया में विद्यालयी उपलब्धियों, सत्यापित परियोजनाओं, सामाजिक सहभागिता, इंटर्नशिप, शोध अभिरुचि तथा साक्षात्कार जैसे तत्वों का संतुलित समावेश किया जा सकता है। इससे केवल स्मरण शक्ति नहीं, बल्कि समस्या समाधान क्षमता, नेतृत्व, सहयोग, नैतिक उत्तरदायित्व और व्यावहारिक समझ का भी मूल्यांकन संभव होगा। हालांकि इसके साथ पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट मानदंड, प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ता और डिजिटल सत्यापन प्रणाली अनिवार्य होगी।

परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं ने विद्यार्थियों के विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया है। ऐसी घटनाएँ केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं। सुरक्षित डिजिटल प्रश्नपत्र प्रबंधन, बहुस्तरीय एन्क्रिप्शन, सीमित अभिगम, परीक्षा केंद्रों का नियमित ऑडिट, स्वतंत्र निगरानी तंत्र, तकनीकी सुरक्षा, उत्तर पुस्तिकाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण तथा दोषियों के विरुद्ध त्वरित दंडात्मक कार्रवाई जैसी व्यवस्थाएँ अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी हैं। साथ ही परीक्षा कैलेंडर को पूरे वर्ष में संतुलित ढंग से वितरित किया जाए ताकि किसी एक परीक्षा पर अत्यधिक दबाव न बने और विद्यार्थियों को तैयारी के लिए पर्याप्त अवसर मिल सकें।

राष्ट्रीय स्तर की एक समान परीक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है। विशाल भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता वाले देश में एक ही मॉडल सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से उपयुक्त हो, यह मान लेना व्यावहारिक नहीं है। विभिन्न विषयों की प्रकृति भी अलग होती है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विधि, कला, सामाजिक विज्ञान और डिजाइन जैसे क्षेत्रों के लिए समान मूल्यांकन पद्धति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती। इसलिए राष्ट्रीय मानकों के साथ संस्थानों को सीमित शैक्षणिक स्वायत्तता देना अधिक संतुलित विकल्प हो सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और संबंधित व्यावसायिक निकायों के दिशा-निर्देशों के भीतर संस्थानों को अपने विषयानुकूल अतिरिक्त मूल्यांकन विकसित करने की अनुमति मिलने से चयन प्रक्रिया अधिक सार्थक बन सकती है।

अभिभावकों की भूमिका भी इस परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक बार सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण कुछ चुनिंदा व्यवसायों को ही सफलता का पर्याय मान लिया जाता है। इससे विद्यार्थी अपनी वास्तविक रुचि और क्षमता की उपेक्षा करने लगते हैं। व्यवस्थित करियर परामर्श, मनोवैज्ञानिक सहयोग, योग्यता परीक्षण और उद्योग जगत से संवाद की व्यवस्था विद्यालय स्तर से ही विकसित की जानी चाहिए। यदि कोई विद्यार्थी कृषि प्रौद्योगिकी, पर्यावरण विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, शिक्षण, डिजाइन, लोक प्रशासन, उद्यमिता, साहित्य, खेल या संगीत में उत्कृष्ट भविष्य देखता है, तो उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने का सम्मानजनक अवसर मिलना चाहिए। विविध करियर विकल्पों की सामाजिक स्वीकृति बढ़े बिना परीक्षा का दबाव कम नहीं होगा।

नई शिक्षा नीति ने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले शिक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं। किंतु किसी भी नीति की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। पर्याप्त वित्तीय निवेश, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, डिजिटल अवसंरचना और ग्रामीण क्षेत्रों तक समान संसाधनों की उपलब्धता के बिना अपेक्षित परिवर्तन संभव नहीं होगा। शिक्षा सुधार को केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित रखने के बजाय उसे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के दैनिक शैक्षणिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उत्तरदायी, संवेदनशील, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले और लोकतांत्रिक मूल्यों से युक्त नागरिक तैयार करना है। जब व्यवस्था विद्यार्थियों को भय, ऋण, तनाव और निरंतर तुलना से मुक्त कर उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखेगी, तभी वास्तविक परिवर्तन दिखाई देगा। तथ्य यह है कि प्रतियोगिता आधुनिक समाज का हिस्सा रहेगी। किंतु यह मत अधिक दूरदर्शी प्रतीत होता है कि प्रतियोगिता का आधार केवल अंक नहीं, बल्कि क्षमता, चरित्र, कौशल, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। भारत यदि ज्ञान आधारित वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को केवल परीक्षार्थी नहीं, बल्कि संभावनाओं से परिपूर्ण नागरिक के रूप में देख सके। तभी शिक्षा सचमुच मानवीय बनेगी और राष्ट्र की प्रगति का सबसे विश्वसनीय आधार भी।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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Author: speedpostnews

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