अवनीश कुमार गुप्ता
वैश्विक अर्थव्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ व्यापार, प्रौद्योगिकी और प्रतिभा अब केवल आर्थिक विकास के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि सामरिक शक्ति के प्रमुख आधार बन चुके हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव-प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अग्रणी बनने की प्रतिस्पर्धा ने विकसित देशों को अपनी आव्रजन नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है। इसी क्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों, विशेषकर एच-1बी वीज़ा धारकों को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस लगातार तेज हुई है। अमेरिकी कांग्रेस में वीज़ा प्रणाली को अधिक कठोर बनाने तथा विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता कम करने से जुड़े अनेक प्रस्तावों ने भारत सहित उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जिनकी बड़ी संख्या में प्रतिभाएँ अमेरिकी तकनीकी उद्योग का आधार रही हैं। हालांकि इन प्रस्तावों में से कई अभी विधायी अथवा न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और अंतिम रूप से लागू नहीं हुए हैं, फिर भी यह स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक प्रतिभा की राजनीति अब पहले से कहीं अधिक जटिल होती जा रही है।
भारत पिछले दो दशकों से विश्व के सबसे बड़े प्रतिभा निर्यातक देशों में रहा है। अमेरिकी सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग, अनुसंधान संस्थान, विश्वविद्यालय और स्वास्थ्य क्षेत्र में भारतीय पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सिलिकॉन वैली से लेकर प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक भारतीय इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और प्रबंधकों ने नवाचार तथा उत्पादकता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यही कारण है कि एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम भारतीय युवाओं के लिए केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि वैश्विक करियर और तकनीकी नेतृत्व का प्रतीक भी बन गया। किंतु अमेरिका की बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं ने इस व्यवस्था को पुनः राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
अमेरिकी नीति-निर्माताओं का तर्क है कि स्थानीय रोजगार, राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता सीमित की जानी चाहिए। कुछ विधायी प्रस्तावों में एच-1बी वीज़ा शुल्क में अत्यधिक वृद्धि, न्यूनतम वेतन मानकों को कठोर बनाने तथा विदेशी पेशेवरों की नियुक्ति पर अतिरिक्त आर्थिक दायित्व लगाने जैसे सुझाव सामने आए। हालाँकि इन प्रस्तावों का बड़ा भाग अभी कानून नहीं बना है और कई मामलों में न्यायालयों ने इनके क्रियान्वयन पर रोक भी लगाई है, फिर भी इन घटनाओं ने वैश्विक श्रम बाज़ार को यह संकेत अवश्य दिया है कि भविष्य में प्रतिभा प्रवाह अधिक प्रतिस्पर्धी और नीति-निर्भर होगा।
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए यह स्थिति विशेष महत्व रखती है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक, टेक महिंद्रा जैसी कंपनियाँ वर्षों से वैश्विक ग्राहकों को सेवाएँ प्रदान करती रही हैं और इनकी परियोजनाओं में अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा की गतिशीलता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि वीज़ा नीतियाँ अधिक कठोर होती हैं, तो इन कंपनियों को स्थानीय स्तर पर अधिक नियुक्तियाँ करनी पड़ सकती हैं, जिससे परिचालन लागत में वृद्धि होगी। दूसरी ओर, कंपनियाँ दूरस्थ कार्य, वैश्विक डिलीवरी केंद्रों तथा भारत स्थित उच्च तकनीकी परिसरों को और अधिक विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ सकती हैं। महामारी के बाद विकसित डिजिटल कार्य-संस्कृति ने इस परिवर्तन को व्यवहारिक विकल्प भी बना दिया है।
भारतीय छात्रों पर भी इन नीतिगत परिवर्तनों का प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका लंबे समय से उच्च शिक्षा का प्रमुख वैश्विक केंद्र रहा है और हजारों भारतीय छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी तथा प्रबंधन के क्षेत्रों में वहाँ अध्ययन करते हैं। अधिकांश छात्रों की दीर्घकालिक योजना शिक्षा के बाद व्यावसायिक अनुभव प्राप्त करने की होती है। यदि रोजगार आधारित वीज़ा व्यवस्था अधिक कठिन होती है, तो विद्यार्थियों को वैकल्पिक देशों अथवा भारत में उपलब्ध अवसरों पर अधिक गंभीरता से विचार करना पड़ सकता है। इससे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, सिंगापुर तथा यूरोप के अन्य देशों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी मजबूत हो सकती है।
हालाँकि इस पूरी परिस्थिति का दूसरा पक्ष भारत के लिए उल्लेखनीय अवसर भी प्रस्तुत करता है। यदि वैश्विक प्रतिभाओं की आवाजाही सीमित होती है, तो बड़ी संख्या में उच्च प्रशिक्षित भारतीय विशेषज्ञ अपने देश में उद्यमिता, अनुसंधान और नवाचार के नए आयाम विकसित कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र, सेमीकंडक्टर मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिशन और विनिर्माण आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। यदि इन पहलों को गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान, निवेश और वैश्विक स्तर की प्रयोगशालाओं से जोड़ा जाए, तो भारत प्रतिभा पलायन को प्रतिभा निवेश में बदल सकता है।
आज विश्व केवल पूँजी की नहीं, बल्कि ज्ञान की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में किसी भी देश की वास्तविक शक्ति उसके प्राकृतिक संसाधनों से अधिक उसके मानव संसाधन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक शक्ति में परिवर्तित होगा जब शिक्षा प्रणाली उद्योगोन्मुख, अनुसंधान आधारित और नवाचार समर्थक बने। केवल डिग्री प्रदान करने वाली व्यवस्था भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को आलोचनात्मक चिंतन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, जैव-प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में दक्ष मानव संसाधन तैयार करने होंगे।
भारत के नीति-निर्माताओं के सामने यह अवसर भी है कि वे वैश्विक स्तर पर लौट रहे भारतीय वैज्ञानिकों, उद्यमियों और विशेषज्ञों के लिए आकर्षक शोध अनुदान, कर प्रोत्साहन, विश्वस्तरीय प्रयोगशालाएँ तथा उद्योग-अकादमिक सहयोग का सुदृढ़ ढाँचा विकसित करें। यदि देश में अनुसंधान के लिए पर्याप्त संसाधन, पारदर्शी संस्थागत वातावरण और दीर्घकालिक नीति स्थिरता सुनिश्चित की जाए, तो अनेक प्रतिभाएँ विदेश जाने के बजाय भारत में ही वैश्विक स्तर के नवाचार केंद्र स्थापित कर सकती हैं। इससे रोजगार, निर्यात, तकनीकी स्वावलंबन और आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी।
भू-राजनीतिक दृष्टि से भी यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है। अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन तथा मित्र देशों के साथ औद्योगिक साझेदारी की नई रणनीतियाँ भारत को वैश्विक विनिर्माण और अनुसंधान केंद्र के रूप में स्थापित करने का अवसर प्रदान कर रही हैं। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने उत्पादन और अनुसंधान केंद्रों का विविधीकरण कर रही हैं। यदि भारत नियामकीय सुधार, न्यायिक दक्षता, बुनियादी ढाँचे और कौशल विकास में निरंतर सुधार करता है, तो वह इस वैश्विक परिवर्तन का सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है।
इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि भारत अपनी विदेश नीति और आर्थिक कूटनीति के माध्यम से प्रतिभा गतिशीलता पर विकसित देशों के साथ संतुलित संवाद बनाए रखे। कुशल पेशेवरों की वैश्विक आवाजाही आधुनिक अर्थव्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता है। अतः दीर्घकालिक समाधान संरक्षणवाद नहीं, बल्कि पारस्परिक सहयोग, कौशल मान्यता, अनुसंधान साझेदारी और नवाचार आधारित आर्थिक संबंधों में निहित है। भारत और अमेरिका दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्य, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक साझेदारी के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। इसलिए वीज़ा व्यवस्था से जुड़े मतभेदों को व्यापक आर्थिक संबंधों के परिप्रेक्ष्य में संतुलित ढंग से देखा जाना चाहिए।
अंततः अमेरिका की बदलती आव्रजन और आर्थिक नीतियाँ भारत के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी हैं। यदि भारत अपनी शिक्षा व्यवस्था, अनुसंधान क्षमता, औद्योगिक नीति और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करता है, तो प्रतिभा पलायन की पुरानी चिंता धीरे-धीरे प्रतिभा नेतृत्व में परिवर्तित हो सकती है। आने वाला दशक उन देशों का होगा जो केवल प्रतिभा को आकर्षित नहीं करेंगे, बल्कि उसे विकसित, संरक्षित और नवाचार के माध्यम से आर्थिक समृद्धि में रूपांतरित करने की क्षमता भी रखते होंगे। भारत के पास यह ऐतिहासिक अवसर उपलब्ध है कि वह अपने युवाओं की ऊर्जा, ज्ञान और रचनात्मकता को राष्ट्रीय विकास की सबसे बड़ी पूँजी में परिवर्तित करे। यही दूरदर्शी रणनीति वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत को आत्मनिर्भर, प्रतिस्पर्धी और ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर कर सकती है।
(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)


