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विश्व पर्यावरण दिवस : उपलब्धियां ही मानव के अस्तित्व के लिए संकट बनीं

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अवनीश कुमार गुप्ता

मानव इतिहास में शायद पहली बार ऐसा समय आया है जब सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियां ही उसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट बनती दिखाई दे रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति, औद्योगिक विस्तार, वैश्विक व्यापार और तेज आर्थिक विकास को आधुनिक युग की सफलता माना गया, लेकिन इसी विकास मॉडल ने पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। वर्ष 2026 का अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक वैश्विक आयोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आत्ममंथन का अवसर है। अब प्रश्न केवल पेड़ बचाने या प्रदूषण कम करने का नहीं रहा; प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान विकास मॉडल भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पृथ्वी छोड़ पाएगा।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, विश्व मौसम संगठन और विभिन्न जलवायु संस्थाओं की रिपोर्टें लगातार यह संकेत दे रही हैं कि पृथ्वी तेजी से जलवायु अस्थिरता की ओर बढ़ रही है। वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। पहली नजर में यह वृद्धि सामान्य लग सकती है, लेकिन इसके प्रभाव अत्यंत गंभीर हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र स्तर बढ़ रहा है, जैव विविधता घट रही है और मौसम की पारंपरिक संरचना टूटती जा रही है।

भारत जैसे देश के लिए यह संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है। भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है, जहाँ विकास की आवश्यकता भी विशाल है और संसाधनों पर दबाव भी अत्यधिक है। लेकिन समस्या केवल जनसंख्या नहीं है। वास्तविक समस्या वह विकास मॉडल है जो संसाधनों के अनियंत्रित दोहन को प्रगति का पर्याय मानता है।

दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और मुंबई जैसे शहरों में वायु प्रदूषण अब मौसमी समस्या नहीं, बल्कि स्थायी सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रदूषित वायु से लाखों लोगों की समयपूर्व मृत्यु होती है। विडंबना यह है कि प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग होता है जिसके पास सुरक्षा के साधन सबसे कम हैं। मजदूर, रिक्शा चालक, निर्माण श्रमिक और सड़क किनारे रहने वाले परिवार जहरीली हवा में जीवन बिताने को मजबूर हैं, जबकि संपन्न वर्ग एयर प्यूरीफायर और बंद परिसरों में स्वयं को सुरक्षित कर लेता है। इस दृष्टि से पर्यावरणीय संकट सामाजिक असमानता का भी प्रश्न है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में संकट का स्वरूप और अधिक गंभीर है। बुंदेलखंड, मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में लगातार जल संकट ने कृषि अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। अनियमित मानसून और भूजल के अत्यधिक दोहन ने किसानों की निर्भरता बढ़ा दी है। हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया, लेकिन रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग ने मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित किया। लंबे समय तक कृषि नीति केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित रही, जबकि मिट्टी, जल और जैव विविधता की स्थिरता पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

वास्तविकता यह है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा “अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग” के सिद्धांत पर आधारित है। वैश्विक बाजार व्यवस्था लगातार नई आवश्यकताएँ पैदा करती है। मोबाइल फोन से लेकर कपड़ों और वाहनों तक, उपभोग को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया है। परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉनिक कचरा, प्लास्टिक प्रदूषण और ऊर्जा खपत अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच गई है। विडंबना यह है कि टिकाऊ विकास की बात करने वाले समाज स्वयं अत्यधिक उपभोक्तावादी जीवनशैली अपनाए हुए हैं।

आज पर्यावरणीय विमर्श की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे अक्सर भावनात्मक अभियान बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि यह मूलतः आर्थिक और राजनीतिक संरचना का विषय है। जब कोई उद्योग जंगल काटता है, नदी प्रदूषित करता है या खनन के नाम पर स्थानीय समुदायों को विस्थापित करता है, तब वह केवल पर्यावरणीय नुकसान नहीं करता; वह सामाजिक असंतुलन और आर्थिक असुरक्षा भी पैदा करता है।

हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में लगातार बढ़ते भूस्खलन, बाढ़ और भू-क्षरण केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं। सड़कों, सुरंगों, होटल निर्माण और अवैज्ञानिक पर्यटन मॉडल ने पर्वतीय पारिस्थितिकी को अस्थिर बना दिया है। लेकिन विकास की बहस में इन प्रश्नों को अक्सर “प्रगति विरोधी सोच” कहकर खारिज कर दिया जाता है।

एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पर्यावरणीय संकट का प्रभाव वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है। जल संकट, खाद्य असुरक्षा और जलवायु आधारित विस्थापन आने वाले दशकों में अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को बढ़ा सकते हैं। अफ्रीका और एशिया के अनेक क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन पहले ही आर्थिक अस्थिरता और पलायन को प्रभावित कर रहा है। भविष्य में यह समस्या राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ सकती है।

भारत में पर्यावरण नीति की सबसे बड़ी कमजोरी क्रियान्वयन की कमी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टें अक्सर औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाती हैं। नगरों में कचरा प्रबंधन योजनाएँ घोषित तो होती हैं, लेकिन अधिकांश शहरों में वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन अब भी अधूरा है। नदियों की सफाई के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, फिर भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक बना रहता है। इसका कारण केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नीति दृष्टि का अभाव है।

पर्यावरणीय संकट को केवल सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। समाज की जीवनशैली में परिवर्तन भी उतना ही आवश्यक है। सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, ऊर्जा बचत, जल संरक्षण और सीमित उपभोग जैसी आदतों को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को केवल परीक्षा विषय की तरह नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन कौशल की तरह पढ़ाया जाना चाहिए।

इसके साथ ही स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान को भी महत्व देना आवश्यक है। राजस्थान के पारंपरिक जल संरक्षण मॉडल, पूर्वोत्तर के सामुदायिक वन प्रबंधन और ग्रामीण भारत की जैविक कृषि पद्धतियाँ आज भी टिकाऊ विकास के उपयोगी उदाहरण हैं। आधुनिक नीति निर्माण ने अक्सर इन अनुभवों को नजरअंदाज किया है।

तकनीकी समाधान निश्चित रूप से आवश्यक हैं। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और हरित अधोसंरचना भविष्य के महत्वपूर्ण विकल्प हो सकते हैं। लेकिन यह समझना होगा कि केवल तकनीक पर्यावरणीय संकट का पूर्ण समाधान नहीं दे सकती। यदि उपभोग और संसाधन दोहन की वर्तमान गति जारी रही, तो हरित तकनीक भी सीमित प्रभाव ही डाल पाएगी।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मानव समाज विकास की अपनी परिभाषा बदलने के लिए तैयार है? आज विकास को मुख्यतः जीडीपी वृद्धि, निर्माण और उपभोग से मापा जाता है। लेकिन यदि आर्थिक विकास के साथ प्रदूषण, जल संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक असमानता भी बढ़ रही हो, तो उस विकास की स्थिरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

भारत “विकसित भारत 2047” की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह लक्ष्य महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है, लेकिन यदि विकास का मॉडल प्रकृति विरोधी रहा, तो भविष्य की आर्थिक उपलब्धियाँ भी अस्थिर हो जाएँगी। विकसित राष्ट्र केवल ऊँची इमारतों, एक्सप्रेस-वे और औद्योगिक उत्पादन से नहीं बनते; वे टिकाऊ संसाधन प्रबंधन, स्वच्छ पर्यावरण और सामाजिक संतुलन से बनते हैं।

अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस 2026 मानव सभ्यता के लिए स्पष्ट चेतावनी है। अब यह बहस का विषय नहीं कि पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या सरकारें, उद्योग और समाज अल्पकालिक लाभ से ऊपर उठकर दीर्घकालिक अस्तित्व को प्राथमिकता देने के लिए तैयार हैं। यदि उत्तर नकारात्मक रहा, तो आने वाले वर्षों में जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रहेगा; वह वैश्विक अर्थव्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता और मानव सुरक्षा का सबसे बड़ा संकट बन जाएगा।

इसलिए अब समय केवल प्रतीकात्मक अभियानों का नहीं, बल्कि कठोर और वैज्ञानिक निर्णयों का है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कोई वैकल्पिक विचार नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बन चुका है।

(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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Author: speedpostnews

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