मानसून (Monsoon) केवल बारिश का नाम नहीं है, बल्कि यह मौसम के अनुसार बदलने वाली हवाओं की एक प्रणाली है। इसका मुख्य कारण भूमि और समुद्र के अलग-अलग गति से गर्म और ठंडा होना है।
मानसून चक्र कैसे काम करता है?
1. गर्मियों में भूमि तेजी से गर्म होती है
अप्रैल–मई में भारतीय उपमहाद्वीप बहुत गर्म हो जाता है।
भूमि के ऊपर कम वायुदाब (Low Pressure) बनता है।
वहीं Indian Ocean अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, इसलिए वहां उच्च वायुदाब (High Pressure) रहता है।
2. समुद्र से नमी वाली हवाएं चलती हैं
हवा हमेशा उच्च दाब से कम दाब की ओर बहती है।
इसलिए समुद्र से नमी से भरी हवाएं भारत की ओर आती हैं।
यही हवाएं दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) कहलाती हैं।
3. दो प्रमुख शाखाएं बनती हैं
Arabian Sea शाखा – Kerala से प्रवेश करती है और Western Ghats से टकराकर भारी वर्षा कराती है।
Bay of Bengal शाखा – पूर्वोत्तर भारत पहुंचती है और फिर उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ती है। Meghalaya और Assam में इसी कारण बहुत अधिक वर्षा होती है।
4. पहाड़ों से टकराने पर बारिश
नमी वाली हवा ऊपर उठती है।
ऊपर जाकर ठंडी होती है।
जलवाष्प बादलों में बदलती है और फिर वर्षा होती है।
5. मानसून की वापसी
सितंबर के अंत से भूमि ठंडी होने लगती है।
अब भूमि पर उच्च वायुदाब बनने लगता है।
हवाएं उल्टी दिशा में समुद्र की ओर बहने लगती हैं। इसे उत्तर-पूर्व मानसून (Northeast Monsoon) या लौटता मानसून कहते हैं।
इस दौरान Tamil Nadu और दक्षिण-पूर्वी तट पर अच्छी वर्षा होती है।
मानसून को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
Intertropical Convergence Zone (ITCZ) का उत्तर-दक्षिण खिसकना।
Himalayas – ठंडी मध्य एशियाई हवाओं को रोकते हैं और मानसूनी हवाओं को ऊपर उठने पर मजबूर करते हैं।
El Niño–Southern Oscillation (एल नीनो और ला नीना) – मानसून कमजोर या मजबूत हो सकता है।
Indian Ocean Dipole – हिंद महासागर के तापमान में अंतर भी वर्षा को प्रभावित करता है।
सरल उदाहरण
इसे ऐसे समझिए:
भूमि = गर्म तवा
समुद्र = ठंडा बर्तन
गर्म तवे के ऊपर हवा ऊपर उठती है।
उसकी जगह ठंडे बर्तन (समुद्र) से नमी वाली हवा आती है।
यही हवा बादल बनाकर बारिश करती है।
यही प्रक्रिया हर वर्ष लगभग जून से सितंबर तक भारत में अधिकांश वर्षा का कारण बनती है।



