माउंट एवरेस्ट (ऊँचाई 8,849 मीटर) दुनिया की सबसे ऊँची चोटी है और यहाँ चढ़ाई करना बेहद ख़तरनाक माना जाता है। 1953 में तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी की पहली सफल चढ़ाई के बाद से अब तक 300 से अधिक पर्वतारोही अपनी जान गंवा चुके हैं। हर साल एवरेस्ट पर औसतन 5–10 लोगों की मौत होती है।
मौत के मुख्य कारण
ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया)
कड़ाके की ठंड और ठंड से शरीर जम जाना (फ्रॉस्टबाइट, हाइपोथर्मिया)
हिमस्खलन (Avalanche)
दरारों (Crevasse) में गिरना
थकावट और ऊँचाई पर बीमारी (Altitude sickness)
शव क्यों सुरक्षित रहते हैं
एवरेस्ट के “डेथ ज़ोन” (8,000 मीटर से ऊपर) पर तापमान बहुत कम रहता है और ऑक्सीजन भी बेहद घट जाती है। वहां शून्य से कई डिग्री नीचे का तापमान कम ऑक्सीजन और बहुत कम बैक्टीरिया की मौजूदगी के कारण शव सड़ते-गलते नहीं हैं और कई सालों तक सुरक्षित पड़े रहते हैं। कई मृत पर्वतारोहियों के शव रास्तों के किनारे अब भी दिखाई देते हैं और कुछ तो चढ़ाई करने वालों के लिए निशान (landmark) की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं।
इसलिए एवरेस्ट से नहीं लाते शव
अनुमान है कि 200 से ज़्यादा शव अब भी एवरेस्ट पर मौजूद हैं। कई जगहों पर शव बर्फ़ और ग्लेशियर में दबे रहते हैं, लेकिन मौसम बदलने से कभी-कभी फिर दिखाई देने लगते हैं। शव नीचे लाना बेहद मुश्किल और महंगा काम है, क्योंकि वहां से एक शव को नीचे लाने का खर्च लगभग 40–80 हज़ार डॉलर तक आ सकता है।



