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मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई स्वयं से

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अवनीश कुमार गुप्ता
मनुष्य का वास्तविक संघर्ष बाहरी संसार से कम और अपने अंतर्मन से अधिक होता है। सभ्यताओं का इतिहास इस सत्य का प्रमाण है कि किसी राष्ट्र का उत्थान केवल उसके प्राकृतिक संसाधनों, आर्थिक समृद्धि अथवा वैज्ञानिक उपलब्धियों से सुनिश्चित नहीं होता, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना, नैतिक मूल्यों और विचारों की गुणवत्ता ही उसके भविष्य का निर्धारण करती है। जब किसी समाज में सत्य की अपेक्षा सुविधा, विवेक की अपेक्षा अंधानुकरण और उत्तरदायित्व की अपेक्षा स्वार्थ को अधिक महत्त्व मिलने लगता है, तब पतन का आरंभ दिखाई दिए बिना ही हो जाता है। सामाजिक अव्यवस्थाएँ अचानक जन्म नहीं लेतीं; वे वर्षों तक व्यक्ति के भीतर पनपने वाले छोटे-छोटे मानसिक विकारों का परिणाम होती हैं। यही कारण है कि किसी भी परिवर्तन की शुरुआत व्यवस्था से पहले व्यक्ति के अंतःकरण से होती है।

रूढ़िवाद तब तक समाज की सांस्कृतिक पहचान का भाग है जब तक वह विवेक और परिवर्तन का विरोध नहीं करता। प्रत्येक परंपरा अपने समय की आवश्यकताओं, परिस्थितियों और अनुभवों से निर्मित होती है, इसलिए समय के साथ उसका परीक्षण भी आवश्यक है। जब परंपरा को अंतिम सत्य घोषित कर दिया जाता है और तर्क, अनुभव तथा वैज्ञानिक दृष्टि को अस्वीकार कर दिया जाता है, तब वही परंपरा प्रगति की सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। समाज का दायित्व केवल अपनी विरासत को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसे समयानुकूल परिष्कृत करना भी है। परिवर्तन का विरोध करना संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता को समाप्त करना है।

कट्टरता विचारों की वह अवस्था है जहाँ संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आग्रह शेष रह जाता है। कट्टर व्यक्ति सुनने की क्षमता खो देता है, क्योंकि उसके लिए सत्य का अर्थ वही होता है जो वह पहले से मानता आया है। संकीर्णता इसी मानसिकता का विस्तार है, जो विविधता को खतरे के रूप में देखती है। जबकि प्रकृति का सबसे बड़ा नियम विविधता ही है। भाषा, संस्कृति, विचार, जीवनशैली और मतों की भिन्नता किसी समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक संपन्नता का प्रमाण होती है। जो समाज मतभेदों को शत्रुता नहीं बनने देता, वही दीर्घकाल तक स्थिर और समृद्ध बना रहता है।

अंधविश्वास केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं है। राजनीति में व्यक्तिपूजा, शिक्षा में रटंत प्रणाली, चिकित्सा में अप्रमाणित उपचार, अर्थव्यवस्था में अवैज्ञानिक निवेश और सामाजिक जीवन में अफवाहों पर विश्वास—ये सभी अंधविश्वास के आधुनिक रूप हैं। जब प्रमाणों के स्थान पर धारणाएँ निर्णय लेने लगती हैं, तब व्यक्ति अपनी स्वतंत्र सोच खो देता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ परंपराओं का विरोध करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विचार को तर्क, अनुभव और प्रमाण की कसौटी पर परखना है। प्रश्न पूछना विद्रोह नहीं, बल्कि ज्ञान की पहली सीढ़ी है।

अज्ञान किसी भी समस्या की जड़ है, किंतु उससे भी अधिक खतरनाक है ज्ञान का भ्रम। आज सूचना का विस्फोट है, परंतु विवेक का विस्तार उसी अनुपात में नहीं हुआ। लोग पढ़ने से अधिक प्रतिक्रिया देने लगे हैं, समझने से अधिक निर्णय सुनाने लगे हैं। ज्ञान केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है; वह दृष्टि है, जो तथ्यों के पीछे छिपे कारणों, परिणामों और संबंधों को समझने की क्षमता प्रदान करती है। शिक्षा यदि केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने का साधन बन जाए और चरित्र निर्माण का माध्यम न रहे, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी शिक्षित जनसंख्या नहीं, बल्कि उसकी विवेकशील जनसंख्या होती है।

अहंकार मनुष्य की सबसे सूक्ष्म और सबसे विनाशकारी कमजोरी है। यह व्यक्ति को अपनी सीमाओं का बोध नहीं होने देता। अभिमान उसे दूसरों से श्रेष्ठ होने का भ्रम देता है और दंभ उसे अपनी कमियों को स्वीकार करने से रोकता है। यही कारण है कि इतिहास में अनेक शक्तिशाली व्यक्ति अपनी बाहरी पराजय से पहले आंतरिक अहंकार के कारण पराजित हुए। विनम्रता का अर्थ स्वयं को छोटा मानना नहीं, बल्कि सत्य को स्वयं से बड़ा मानना है। जो व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, उसका विकास उसी क्षण रुक जाता है।

स्वार्थ, लालच, लोभ, मोह और तृष्णा मनुष्य की इच्छाओं को आवश्यकता से अलग कर देते हैं। आवश्यकता जीवन को चलाती है, जबकि तृष्णा जीवन को नियंत्रित करने लगती है। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने सफलता को संपत्ति, प्रतिष्ठा और प्रदर्शन से जोड़ दिया है। परिणामस्वरूप संतोष का स्थान निरंतर तुलना ने ले लिया है। जिस समाज में व्यक्ति अपनी उपलब्धियों से अधिक दूसरों की उपलब्धियों की चिंता करता है, वहाँ मानसिक तनाव, असंतोष और सामाजिक दूरी स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगती है। धन का होना समस्या नहीं है; धन का उद्देश्य बन जाना समस्या है। जब साधन ही साध्य बन जाएँ, तब नैतिकता सबसे पहले प्रभावित होती है।

मत्सर, ईर्ष्या और द्वेष की उत्पत्ति तुलना से होती है। तुलना यदि प्रेरणा दे तो विकास का साधन है, किंतु यदि वह दूसरे के पतन में सुख खोजने लगे तो वही विनाश का कारण बन जाती है। आज सामाजिक माध्यमों ने तुलना की संस्कृति को अभूतपूर्व गति दी है। लोग दूसरों के जीवन के श्रेष्ठ क्षणों की तुलना अपने जीवन की सामान्य परिस्थितियों से करने लगे हैं। इससे आत्मविश्वास कम होता है और असंतोष बढ़ता है। प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियाँ, संघर्ष, अवसर और गति अलग होती है। इसलिए स्वस्थ समाज वह है जहाँ प्रतिस्पर्धा से अधिक आत्मविकास को महत्त्व दिया जाए।

द्वेष, विद्वेष, दुर्भावना, नफरत, प्रतिशोध, क्रोध और हिंसा व्यक्ति के भीतर की असुरक्षा के बाहरी रूप हैं। जो व्यक्ति स्वयं से संतुष्ट नहीं होता, वह प्रायः दूसरों को दोषी ठहराकर मानसिक संतुलन खोजने का प्रयास करता है। हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती; कटु शब्द, अपमान, सामाजिक बहिष्कार, झूठा प्रचार और मानसिक उत्पीड़न भी हिंसा के ही रूप हैं। किसी समाज की सभ्यता का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जाता कि वहाँ कितने लोग सहमत हैं, बल्कि इस आधार पर किया जाता है कि वहाँ असहमति का सम्मान कितना सुरक्षित है। संवाद लोकतंत्र की आत्मा है और सहिष्णुता उसकी सबसे बड़ी शक्ति।

छल, कपट, धोखा, बेईमानी, पाखंड और भ्रष्टाचार समाज में अचानक उत्पन्न नहीं होते। वे तब जन्म लेते हैं जब व्यक्तिगत सुविधा को सामूहिक उत्तरदायित्व से ऊपर रखा जाने लगता है। भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है; यह विश्वास का ह्रास है। जब नागरिक व्यवस्था पर विश्वास खो देते हैं, तब विकास की गति चाहे जितनी दिखाई दे, उसकी नींव कमजोर हो जाती है। ईमानदारी केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। जिस समाज में सत्यनिष्ठा सम्मान का विषय बनती है और बेईमानी सामाजिक लज्जा का कारण, वहीं स्थायी प्रगति संभव होती है।

यही वे मानसिक और नैतिक प्रवृत्तियाँ हैं जो धीरे-धीरे व्यक्ति के चरित्र, परिवार के संस्कार, समाज की संस्कृति और राष्ट्र की दिशा को प्रभावित करती हैं। इसलिए किसी भी सुधार की शुरुआत कानूनों से पहले चेतना में, नीतियों से पहले नैतिकता में और विकास से पहले आत्ममंथन में होनी चाहिए। बाहरी परिवर्तन तभी स्थायी होते हैं जब उनके पीछे आंतरिक परिवर्तन की दृढ़ आधारशिला उपस्थित हो।

अन्याय, अत्याचार, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, सांप्रदायिकता और वैमनस्य किसी भी राष्ट्र के सामाजिक स्वास्थ्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। इनका प्रभाव केवल पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता को भी प्रभावित करता है। जब जन्म, जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी मनुष्य का मूल्य निर्धारित किया जाने लगे, तब संविधान की भावना और मानवता का मूल दर्शन दोनों आहत होते हैं। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था अथवा जनसंख्या में नहीं, बल्कि इस तथ्य में निहित होती है कि उसका सबसे कमजोर नागरिक भी स्वयं को समान सम्मान और अवसर का अधिकारी महसूस करे। सामाजिक न्याय केवल न्यायालयों का विषय नहीं, बल्कि परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन की संस्कृति का अभिन्न अंग होना चाहिए।

असत्य, मिथ्याचार, असंवेदनशीलता, निर्दयता और निष्ठुरता आधुनिक समाज की वे मौन विकृतियाँ हैं जो धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का रूप धारण कर लेती हैं। आज सूचना का प्रवाह तीव्र है, किंतु संवेदना का विस्तार उतनी गति से नहीं हो रहा। किसी दुर्घटना या पीड़ा को सहायता के अवसर के बजाय दृश्य सामग्री के रूप में देखना मानवीय चेतना के क्षरण का संकेत है। करुणा सभ्यता का आभूषण नहीं, उसका आधार है। जो समाज दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझने की क्षमता खो देता है, वह आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भी नैतिक रूप से निर्धन बना रहता है।

अकर्मण्यता, आलस्य और प्रमाद व्यक्ति की क्षमताओं को भीतर ही भीतर समाप्त कर देते हैं। अवसरवाद और चापलूसी योग्यता की प्रतिष्ठा को कमज़ोर करते हैं तथा परिश्रम के स्थान पर सुविधा को स्थापित करते हैं। भय, असुरक्षा और कायरता मनुष्य को सत्य के पक्ष में खड़े होने से रोकते हैं। अविवेक, असंयम और असंतोष निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हैं, जबकि कुंठा व्यक्ति को स्वयं की असफलताओं के लिए सदैव दूसरों को दोषी ठहराने की आदत सिखाती है। इन प्रवृत्तियों का परिणाम केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि सामूहिक निष्क्रियता के रूप में सामने आता है। जब योग्य लोग मौन हो जाते हैं और अवसरवादी सक्रिय हो जाते हैं, तब संस्थाओं का क्षरण आरम्भ हो जाता है।

अनैतिकता, अविश्वास, असमानता, उपेक्षा, हठधर्मिता, नकारात्मकता और नैतिक पतन किसी समाज में एक दिन में उत्पन्न नहीं होते। इनकी जड़ें उन छोटे-छोटे समझौतों में होती हैं जिन्हें लोग सुविधा के नाम पर स्वीकार कर लेते हैं। सड़क पर नियम तोड़ने से लेकर सार्वजनिक संपत्ति की उपेक्षा तक, रिश्वत देने से लेकर असत्य को मौन स्वीकृति देने तक-प्रत्येक छोटी अनैतिकता भविष्य के बड़े संकट की आधारशिला बनती है। राष्ट्र केवल संविधान और संस्थाओं से संचालित नहीं होता; वह नागरिकों के दैनिक आचरण से भी निर्मित होता है। इसलिए नैतिकता को केवल उपदेश का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार का संस्कार बनाना आवश्यक है।

इन सभी विकृतियों का समाधान केवल कठोर कानूनों, दंडात्मक व्यवस्थाओं अथवा प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं है। कानून भय उत्पन्न कर सकता है, किंतु चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। चरित्र का निर्माण परिवार में संस्कारों से, विद्यालय में मूल्यपरक शिक्षा से, समाज में उत्तरदायी संवाद से, साहित्य में संवेदनशील विचारों से और व्यक्तिगत जीवन में सतत आत्मानुशासन से होता है। यदि शिक्षा केवल कौशल दे और चरित्र न दे, यदि राजनीति केवल सत्ता दे और सेवा न दे, यदि विज्ञान केवल साधन दे और विवेक न दे, तो विकास अधूरा रहेगा। ज्ञान, नैतिकता और उत्तरदायित्व का समन्वय ही स्वस्थ समाज की वास्तविक पहचान है।

परिवार इस परिवर्तन की प्रथम पाठशाला है। बालक वही सीखता है जो वह देखता है। यदि घर में सत्य, श्रम, अनुशासन, करुणा और समानता का वातावरण होगा, तो वही संस्कार उसके व्यक्तित्व का स्थायी आधार बनेंगे। विद्यालयों को केवल परीक्षा परिणामों का केंद्र नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के निर्माण का संस्थान बनना होगा। विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र चिंतन, तर्क, शोध और सामाजिक उत्तरदायित्व की संस्कृति विकसित करनी होगी। मीडिया को सनसनी के स्थान पर तथ्य, संवाद और जनहित को प्राथमिकता देनी चाहिए। साहित्य और कला को भी मनोरंजन के साथ-साथ समाज की नैतिक चेतना को जागृत करने का दायित्व निभाना होगा।

स्थानीय स्तर पर भी परिवर्तन की अपार संभावनाएँ हैं। ग्राम सभाएँ, नगर समितियाँ, पुस्तकालय, युवा मंडल, स्वयंसेवी संस्थाएँ और सामाजिक संगठन यदि स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति, साक्षरता, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक कर्तव्यों पर निरंतर जनजागरण चलाएँ, तो परिवर्तन अधिक स्थायी होगा। जब नागरिक केवल अधिकारों की नहीं, कर्तव्यों की भी चर्चा करने लगेंगे, तभी लोकतंत्र परिपक्व होगा। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, यातायात नियमों का पालन, करों का ईमानदारी से भुगतान, जल और ऊर्जा का संयमित उपयोग तथा सामाजिक सद्भाव बनाए रखना भी राष्ट्रसेवा के ही स्वरूप हैं।

भारतीय चिंतन ने सदैव आत्मविजय को विश्वविजय से अधिक महत्त्व दिया है। उपनिषदों से लेकर बुद्ध, महावीर, कबीर, गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी तक सभी ने मनुष्य के भीतर परिवर्तन को ही बाहरी परिवर्तन का मूल आधार माना। जब तक मनुष्य अपने भीतर छिपे अहंकार, लालच, द्वेष और असत्य को पराजित नहीं करता, तब तक कोई भी सामाजिक व्यवस्था स्थायी रूप से आदर्श नहीं बन सकती। राष्ट्र का चरित्र उसके नागरिकों के चरित्र का ही विस्तृत रूप होता है।

अंततः यह स्मरण रखना होगा कि सभ्यता का भविष्य तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि नैतिक चेतना से सुरक्षित होता है। यदि विवेक श्रद्धा का मार्गदर्शन करे, विज्ञान संवेदना के साथ चले, शक्ति न्याय के अधीन रहे और विकास मानवीय गरिमा को केंद्र में रखे, तभी सच्चे अर्थों में प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव होगा। आत्मचिंतन, सत्यनिष्ठा, करुणा, उत्तरदायित्व और सतत आत्मपरिष्कार ही वे प्रकाशस्तंभ हैं जो व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक, समाज को सशक्त समुदाय और राष्ट्र को स्थायी रूप से समृद्ध एवं मानवीय सभ्यता में रूपांतरित कर सकते हैं। यही आत्मविजय, राष्ट्रविजय की सबसे विश्वसनीय और शाश्वत आधारशिला है।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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Author: speedpostnews

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