कांतिलाल मांडोत
सदियों तक जिस दुनिया ने वंश चलाने के नाम पर बेटों को प्राथमिकता दी, उसी दुनिया में आज एक गहरा और सुखद बदलाव आकार ले रहा है। भारत, चीन जैसे विकासशील देशों से लेकर अमेरिका और यूरोप तक, समाज की सामूहिक चेतना में बेटियों को लेकर दृष्टिकोण बदल रहा है। जो बेटी कभी बोझ मानी जाती थी, वही आज भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक रूप से परिवार की सबसे बड़ी ताकत के रूप में देखी जाने लगी है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सोच, संवेदना और रिश्तों के पुनर्परिभाषित होने का संकेत है।
भारत में यह परिवर्तन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 1999 में जहां 33 प्रतिशत परिवार बेटों की चाहत रखते थे, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर करीब 15 प्रतिशत रह गया है। शहरी भारत में एक बच्चा और वह भी बेटी,यह सोच तेजी से स्वीकार की जा रही है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि सामाजिक आंदोलनों, शिक्षा, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और सरकारी अभियानों का संयुक्त परिणाम है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी मुहिम ने केवल नारे नहीं दिए, बल्कि समाज के मानस में लंबे समय से जमी धारणाओं को चुनौती दी।
चीन का उदाहरण भी इसी दिशा में संकेत करता है। वहां 2000 में जन्म के समय लिंगानुपात 117 तक पहुंच गया था, जो दुनिया में सबसे असंतुलित स्तरों में से एक था। लेकिन 2023 तक यह घटकर करीब 111 हो गया। भारत में भी 2010 में 109 रहने वाला यह अनुपात अब 107 तक आ चुका है। यह पूरी तरह संतुलित भले न हो, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि समाज धीरे-धीरे प्राकृतिक औसत की ओर लौट रहा है। यह उस दौर के बाद का बदलाव है, जब अल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकों के दुरुपयोग ने जनसांख्यिकीय संतुलन को बुरी तरह बिगाड़ दिया था और करोड़ों बेटियों को जन्म लेने से पहले ही दुनिया से वंचित कर दिया गया।
पिछले पच्चीस वर्षों में भारत में करीब 70 लाख बेटियों का बचाया जाना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक परिवर्तन का प्रमाण है, जिसमें बेटी को जीवन का भार नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना जाने लगा है। यह बदलाव केवल भारत या एशिया तक सीमित नहीं है। यूरोप, स्कैंडिनेवियाई देशों और जापान जैसे विकसित समाजों में भी माता-पिता अब बेटियों को प्राथमिकता देने लगे हैं। जापान में एक बच्चा चाहने वाले करीब तीन-चौथाई दंपती बेटी को प्राथमिकता देते हैं। स्कैंडिनेविया में दो बेटियों वाले परिवारों की संख्या अब दो बेटों वाले परिवारों से अधिक हो रही है। यह दर्शाता है कि आधुनिक समाज रिश्तों को केवल उत्तराधिकार या नाम के विस्तार से नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन और जीवन की गुणवत्ता से जोड़कर देखने लगा है।
इस बदलती सोच के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण भावनात्मक जुड़ाव है। सामाजिक शोध और पारिवारिक अनुभव बताते हैं कि बेटियां माता-पिता के साथ अधिक संवेदनशील, सहानुभूतिपूर्ण और स्थायी भावनात्मक संबंध बनाती हैं। उम्र बढ़ने के साथ जब माता-पिता को देखभाल, संवाद और साथ की जरूरत होती है, तब बेटियां अधिक निकट और सक्रिय भूमिका निभाती हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में, जहां संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और अकेलापन बढ़ रहा है, वहां यह भावनात्मक सुरक्षा एक बड़ा कारण बनकर उभरी है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण आर्थिक और सामाजिक बदलाव है। महिलाएं अब केवल घरेलू दायरे तक सीमित नहीं हैं। शिक्षा, रोजगार, राजनीति, खेल, विज्ञान और अंतरिक्ष तक में बेटियों ने अपनी क्षमता साबित की है। वे न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि परिवार के आर्थिक फैसलों में भी बराबरी से भागीदारी निभा रही हैं। जब बेटी कमाने लगती है, फैसले लेने लगती है और माता-पिता के लिए संबल बनती है, तो उसे बोझ मानने की मानसिकता स्वतः कमजोर पड़ जाती है। दहेज जैसी कुरीतियों में आई कमी और कानूनी सख्ती ने भी इस सोच को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है।
इस पूरे बदलाव के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल उभरता है।जब बेटियों की चाहत बढ़ रही है, तो बेटों से दूरी क्यों महसूस की जाने लगी है। इसका उत्तर बेटों के खिलाफ नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना में आए बदलाव में छिपा है। पारंपरिक समाज में बेटों से यह अपेक्षा जुड़ी होती थी कि वे माता-पिता के साथ रहेंगे, उनकी देखभाल करेंगे और परिवार का नाम आगे बढ़ाएंगे। लेकिन आधुनिक शहरी जीवन में बेटों पर करियर, स्थानांतरण और आर्थिक दबाव इतने बढ़ गए हैं कि वे अक्सर माता-पिता से भौतिक रूप से दूर हो जाते हैं। नौकरी के अवसर उन्हें दूसरे शहरों या देशों तक ले जाते हैं, जहां परिवार से दूरी एक मजबूरी बन जाती है।
इसके विपरीत, बेटियां अब भी भावनात्मक रूप से जुड़े रहने की कोशिश करती हैं, चाहे वे शादी के बाद किसी और शहर में क्यों न हों। तकनीक, संवाद और बदलते पारिवारिक मानदंडों ने बेटियों को पराया धन की संकीर्ण परिभाषा से बाहर निकाल दिया है। वे मायके और ससुराल दोनों के बीच सेतु बन रही हैं। यही कारण है कि आधुनिक माता-पिता भविष्य की सुरक्षा और साथ के लिए बेटियों को अधिक भरोसेमंद मानने लगे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल होते जेंडर रिवील वीडियो और जेंडर डिसअपॉइंटमेंट पर खुली चर्चाएं भी इस बदलाव की ओर इशारा करती हैं। जहां पहले बेटे के जन्म पर जश्न और बेटी पर चुप्पी होती थी, वहीं अब कई परिवार बेटी के जन्म को गर्व और खुशी के साथ साझा कर रहे हैं। यह सार्वजनिक स्वीकृति निजी सोच को भी बदल रही है। गैलप इंटरनेशनल के 44 देशों में किए गए अध्ययन में 65 प्रतिशत लोगों का यह कहना कि बच्चे का जेंडर उनके लिए मायने नहीं रखता, इस वैश्विक परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
भारत में इस बदलाव की आज की प्रासंगिकता और भी गहरी है। एक युवा देश होने के बावजूद भारत तेजी से बूढ़ी होती आबादी की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों से भी तय होगी। बेटियां, जो भावनात्मक रूप से जुड़े रहकर माता-पिता की देखभाल करती हैं, इस सामाजिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसके साथ ही, लैंगिक संतुलन का सुधरना समाज में अपराध, असमानता और हिंसा जैसे मुद्दों पर भी सकारात्मक असर डाल सकता है।
यह भी सच है कि जन्म के समय लिंगानुपात अभी पूरी तरह संतुलित नहीं हुआ है। ग्रामीण और कुछ सामाजिक वर्गों में पुरानी सोच अब भी मौजूद है। लेकिन जिस तरह पिछले दो दशकों में अंतर तेजी से घटा है, वह उम्मीद जगाता है कि आने वाले वर्षों में यह संतुलन और सुधरेगा। मोदी सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहल ने केवल सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद के स्तर पर भी असर डाला है। इस मुहिम ने बेटी को बचाने से आगे बढ़कर उसे पढ़ाने, आगे बढ़ाने और गर्व का विषय बनाने की सोच को मजबूत किया है।
अंततः यह बदलाव केवल बेटियों की जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज की जीत है। जब किसी समाज में जन्म से पहले ही किसी बच्चे का भविष्य तय न किया जाए, जब प्यार और अवसर लिंग से नहीं, क्षमता और संवेदना से तय हों, तभी वह समाज वास्तव में प्रगतिशील कहलाता है। बेटियों की ओर झुकती दुनिया इस बात का संकेत है कि मानवता धीरे-धीरे उस बिंदु पर लौट रही है, जहां जीवन का मूल्य उसकी पहचान से नहीं, उसके अस्तित्व से तय होता है। यह परिवर्तन भले ही अधूरा हो, लेकिन इसकी दिशा सही है और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं)



