–अवनीश कुमार गुप्ता
भारत में महंगाई हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का सबसे प्रभावशाली हथियार बन गई है। रसोई गैस की बढ़ती कीमतों से लेकर पेट्रोल-डीजल, सब्जियों, दालों और स्कूल फीस तक, हर बढ़ता खर्च सीधे आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करता है। यही कारण है कि जैसे ही महंगाई बढ़ती है, राजनीतिक दल इसे जनता की भावनाओं से जोड़कर अपने-अपने तरीके से भुनाने लगते हैं। सत्ता पक्ष वैश्विक परिस्थितियों, युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकटों का हवाला देता है, जबकि विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और जनविरोधी नीतियों का परिणाम बताता है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है कि आखिर महंगाई पर राजनीति ज्यादा और समाधान कम क्यों दिखाई देता है?
असल में महंगाई का राजनीतिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह हर वर्ग को प्रभावित करती है। बेरोजगारी या आर्थिक मंदी जैसी समस्याओं का असर अलग-अलग स्तर पर महसूस होता है, लेकिन महंगाई सीधे हर घर की रसोई तक पहुंचती है। जब टमाटर सौ रुपये किलो होता है, रसोई गैस का सिलेंडर हजार रुपये पार करता है या दूध और दाल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तब जनता की नाराजगी स्वाभाविक रूप से सरकार की ओर मुड़ती है। राजनीतिक दल इस मनोविज्ञान को भलीभांति समझते हैं। यही कारण है कि चुनावों के दौरान महंगाई अचानक सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक भाषणों के पीछे दब जाता है।
भारत की राजनीति में महंगाई का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। एक समय प्याज की बढ़ती कीमतों ने सरकारों को संकट में डाल दिया था। कई चुनावों में रसोई गैस और पेट्रोल की कीमतें निर्णायक मुद्दा बनीं। विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल महंगाई के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं, सिलेंडर लेकर प्रदर्शन करते हैं, जनता के बीच सरकार की आलोचना करते हैं और राहत देने के बड़े वादे करते हैं। लेकिन सत्ता में आते ही वही दल आर्थिक मजबूरियों का हवाला देने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल नीतियों की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं की भी है।
दरअसल, महंगाई को नियंत्रित करना किसी एक फैसले से संभव नहीं होता। इसके पीछे कई जटिल कारण काम करते हैं। भारत अभी भी कच्चे तेल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही इसका सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है, और परिवहन महंगा होने से लगभग हर वस्तु की कीमत बढ़ जाती है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून, कृषि उत्पादन में कमी और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान जैसी परिस्थितियां भी महंगाई को बढ़ाती हैं। लेकिन राजनीतिक बहस में इन जटिल कारणों पर गंभीर चर्चा कम होती है। वहां केवल आरोप-प्रत्यारोप और भावनात्मक बयानबाजी दिखाई देती है।
महंगाई पर समाधान कम दिखाई देने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सरकारें अक्सर अल्पकालिक राहत देने वाली नीतियों पर ज्यादा ध्यान देती हैं। चुनावी राजनीति में तुरंत परिणाम दिखाना जरूरी माना जाता है। इसलिए टैक्स में अस्थायी कटौती, मुफ्त राशन, सब्सिडी या नकद सहायता जैसी योजनाओं को प्राथमिकता मिलती है। ये कदम तत्काल राहत तो देते हैं, लेकिन समस्या की जड़ पर चोट नहीं करते। उदाहरण के लिए, यदि कृषि क्षेत्र में भंडारण व्यवस्था कमजोर है और फसल खराब होने पर बाजार में आपूर्ति घट जाती है, तो कीमतें बढ़ना तय है। हर साल प्याज, टमाटर या दाल की कीमतों में अचानक उछाल इसी संरचनात्मक कमजोरी का परिणाम होता है। सरकारें आयात या निर्यात प्रतिबंध लगाकर अस्थायी नियंत्रण तो कर लेती हैं, लेकिन कृषि अवसंरचना को मजबूत करने की दिशा में अपेक्षित गति से काम नहीं हो पाता।
भारत की कर व्यवस्था भी महंगाई की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले कर सरकारों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत हैं। जब तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें घटती हैं, तब भी आम जनता को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता क्योंकि सरकारें कर बढ़ाकर राजस्व संतुलित करने की कोशिश करती हैं। विपक्ष इसे जनता पर बोझ बताता है, लेकिन जब वही दल सत्ता में आते हैं तो वे भी करों में बड़ी कटौती से बचते हैं। इसका कारण यह है कि सरकारें विकास परियोजनाओं, कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों के लिए भारी राजस्व पर निर्भर रहती हैं। ऐसे में जनता को राहत देने और सरकारी आय बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाता है।
आज का मध्यमवर्ग महंगाई का सबसे बड़ा बोझ उठा रहा है। गरीब वर्ग को कुछ हद तक मुफ्त राशन, सब्सिडी और सरकारी योजनाओं से राहत मिल जाती है, जबकि उच्च आय वर्ग पर महंगाई का असर अपेक्षाकृत सीमित होता है। लेकिन मध्यमवर्ग वह वर्ग है जो नियमित टैक्स देता है, निजी स्कूलों और अस्पतालों पर खर्च करता है तथा मासिक ऋण किश्तों पर आधारित जीवनशैली जीता है। उसकी आय सीमित गति से बढ़ती है, लेकिन खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि आर्थिक विकास और जीडीपी वृद्धि के बड़े दावों के बावजूद मध्यमवर्ग के भीतर असुरक्षा और असंतोष बढ़ रहा है। राजनीतिक दल इस वर्ग की भावनाओं को समझते हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान खोजने की बजाय अधिकतर घोषणात्मक राजनीति करते हैं।
महंगाई का एक सामाजिक प्रभाव भी है, जिस पर कम चर्चा होती है। लगातार बढ़ती कीमतें केवल आर्थिक दबाव नहीं बढ़ातीं, बल्कि मानसिक तनाव और सामाजिक असंतोष को भी जन्म देती हैं। परिवारों का बजट बिगड़ता है, बचत कम होती है और भविष्य को लेकर असुरक्षा बढ़ती है। कई लोग बेहतर जीवन के लिए कर्ज पर निर्भर हो जाते हैं। मासिक ऋण किश्तों पर आधारित जीवनशैली ने एक ऐसे समाज को जन्म दिया है, जहां आय बढ़ने के बावजूद आर्थिक स्थिरता कमजोर होती जा रही है। लेकिन राजनीतिक विमर्श में इन सामाजिक और मानसिक प्रभावों की चर्चा शायद ही कभी होती है।
टीवी डिबेट और सोशल मीडिया ने भी महंगाई की बहस को सतही बना दिया है। आर्थिक नीतियों पर गंभीर चर्चा की जगह अब राजनीतिक नारों और आंकड़ों की लड़ाई ने ले ली है। कोई यह नहीं पूछता कि भारत की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत कैसे किया जाए, कृषि बाजारों में बिचौलियों की भूमिका कैसे घटे, या ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को तेजी से कैसे बढ़ाया जाए। बहस का स्तर अक्सर इस तुलना तक सीमित रह जाता है कि किस सरकार के समय महंगाई ज्यादा थी। इससे जनता को वास्तविक समाधान के बजाय केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण देखने को मिलता है।
महंगाई पर नियंत्रण के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि की है। कृषि क्षेत्र में आधुनिक भंडारण व्यवस्था, कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क और बेहतर परिवहन प्रणाली विकसित करनी होगी ताकि फसल खराब होने और आपूर्ति संकट को कम किया जा सके। ऊर्जा क्षेत्र में आयात निर्भरता घटाने के लिए सौर और हरित ऊर्जा को तेजी से बढ़ावा देना होगा। स्थानीय उत्पादन को मजबूत करना और छोटे उद्योगों को स्थिर समर्थन देना भी जरूरी है। यदि उत्पादन बढ़ेगा और आपूर्ति मजबूत होगी, तभी कीमतों पर स्थायी नियंत्रण संभव हो पाएगा।
इसके अलावा रोजगार सृजन भी महंगाई से लड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि लोगों की आय बढ़ेगी, तभी वे बढ़ती कीमतों का सामना बेहतर तरीके से कर पाएंगे। लेकिन वर्तमान समय में बड़ी चुनौती यह है कि आर्थिक विकास के बावजूद पर्याप्त गुणवत्ता वाली नौकरियां नहीं बन पा रही हैं। बेरोजगारी और महंगाई का संयुक्त प्रभाव युवाओं में निराशा बढ़ा रहा है। जब नौकरी सीमित हो और खर्च लगातार बढ़ते जाएं, तब आर्थिक विकास के बड़े दावे आम आदमी को खोखले लगने लगते हैं।
राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि महंगाई केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक विश्वास से जुड़ा प्रश्न है। यदि जनता को लगातार यह महसूस होने लगे कि हर सरकार केवल आरोप लगाने में व्यस्त है और समाधान देने में नहीं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होने लगता है। जनता को केवल भाषण नहीं, बल्कि पारदर्शी आर्थिक नीति और स्पष्ट रोडमैप चाहिए।
महंगाई पर राजनीति पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती, क्योंकि लोकतंत्र में जनता की समस्याओं को उठाना विपक्ष और सत्ता दोनों की जिम्मेदारी है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीति समाधान से बड़ी हो जाती है। जब हर आर्थिक संकट को केवल चुनावी अवसर की तरह देखा जाने लगे, तब नीतिगत गंभीरता पीछे छूट जाती है। भारत जैसे विशाल देश में महंगाई का समाधान आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। आवश्यकता ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति, दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों और जनता के प्रति जवाबदेही की है।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो हर चुनाव में महंगाई पर नए नारे सुनाई देंगे, नए वादे किए जाएंगे, नए आरोप लगाए जाएंगे, लेकिन आम आदमी की रसोई का संघर्ष वैसा ही बना रहेगा। लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि जनता के जीवन को स्थिर और सम्मानजनक बनाने में होती है। महंगाई पर राजनीति कम और समाधान ज्यादा तभी दिखाई देगा, जब सरकारें और राजनीतिक दल अल्पकालिक लाभ से ऊपर उठकर दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देंगे।
(लेखक पिछले चौदह वर्षों से दैनिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा विभिन्न मंचों पर नियमित लेखन कर रहे हैं। इनकी अनेक कविताएं, समसामयिक आलेख और वैचारिक टिप्पणियां प्रकाशित हो चुकी हैं)



