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देश में बढ़ते तापमान का प्रभाव; भूजल स्तर में आ रही गिरावट और 60 करोड़ लोगों के सामने पानी का संकट

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अवनीश कुमार गुप्ता

हाल के दिनों में उत्तर और मध्य भारत के कई शहरों दिल्ली, लखनऊ, जयपुर और नागपुर में पारा जिस तेजी से 45 डिग्री सेल्सियस के पार गया है, उसने गर्मी को एक सामान्य मौसमी अनुभव से आगे बढ़ाकर एक सार्वजनिक संकट का रूप दे दिया है। कई स्थानों पर लगातार पाँच से सात दिनों तक तापमान सामान्य से 5-6 डिग्री अधिक बना रहा, जबकि जलापूर्ति में कटौती और सूखते जलाशयों की खबरें समानांतर चलती रहीं। यह परिदृश्य किसी एक वर्ष का अपवाद नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रवृत्ति का संकेत है जो पिछले दशक में स्पष्ट रूप से गहरी हुई है। भारतीय मौसम विभाग के आँकड़े बताते हैं कि हीटवेव के दिनों की संख्या में लगभग 30-40 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। इसी के साथ जल संकट का फैलाव भी बढ़ा है-देश की बड़ी आबादी, अनुमानतः 60 करोड़ लोग, किसी न किसी रूप में पानी की कमी से जूझ रहे हैं और कई बड़े शहरों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

इस बदलती स्थिति को केवल वैश्विक जलवायु परिवर्तन की अनिवार्यता मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। यह सच है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है, और इसके प्रभाव दुनिया भर में महसूस किए जा रहे हैं। लेकिन भारतीय शहरों में यह संकट जिस तीव्रता से उभर रहा है, उसमें स्थानीय कारकों की भूमिका कम नहीं है। शहरी विस्तार की मौजूदा दिशा-जहाँ कंक्रीट और डामर का वर्चस्व है, हरित क्षेत्रों का लगातार क्षरण हो रहा है और जल निकायों को पाटकर निर्माण किए जा रहे हैं, ने ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ाया है। कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि बड़े शहरों के भीतरी हिस्सों में तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 3 से 5 डिग्री तक अधिक हो सकता है। जब यह अंतर पहले से बढ़े हुए वैश्विक तापमान के साथ जुड़ता है, तो गर्मी का असर असहनीय हो उठता है।

भारत का शहरीकरण पिछले तीन दशकों में तेजी से बढ़ा है। 1991 में जहाँ शहरी आबादी लगभग 26 प्रतिशत थी, वहीं 2021 तक यह करीब 35 प्रतिशत तक पहुँच गई और अनुमान है कि 2030 तक यह 40 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी। लेकिन यह विस्तार अधिकतर अनियोजित रहा है। शहरों के फैलाव में प्राकृतिक संसाधनों और भूगोल की सीमाओं का समुचित ध्यान नहीं रखा गया। अनेक स्थानों पर तालाब, झीलें और नाले-जो कभी जल संचयन और निकासी के स्वाभाविक माध्यम थे-या तो सिकुड़ गए या पूरी तरह गायब हो गए। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आँकड़े संकेत देते हैं कि देश के लगभग 17 प्रतिशत भूजल ब्लॉक ‘अत्यधिक दोहन’ की स्थिति में पहुँच चुके हैं और कई शहरों में हर वर्ष औसतन 0.5 से 1 मीटर तक भूजल स्तर गिर रहा है।

इसका असर सबसे पहले आम नागरिक के जीवन में दिखाई देता है। शहरी जल आपूर्ति में असमानता अब स्पष्ट और स्थायी रूप लेती जा रही है। एक ओर कुछ विकसित कॉलोनियों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 180–200 लीटर पानी उपलब्ध है, वहीं दूसरी ओर बड़ी आबादी-विशेषकर झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहने वाले लोग 40-50 लीटर प्रतिदिन पर निर्भर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन जहाँ न्यूनतम 100 लीटर प्रतिदिन की सिफारिश करता है, वहाँ इस अंतर का सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव सहज समझा जा सकता है। पानी के लिए लंबी कतारें, टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता और निजी जल बाज़ार का विस्तार यह दर्शाता है कि पानी धीरे-धीरे एक सार्वजनिक अधिकार से हटकर एक वस्तु में बदलता जा रहा है।

गर्मी का यह असर श्रमिक वर्ग के लिए और भी कठोर रूप में सामने आता है। निर्माण स्थलों, सड़कों और खुले कारखानों में काम करने वाले लाखों श्रमिकों के लिए हीटवेव सीधे स्वास्थ्य जोखिम में बदल जाती है। अत्यधिक तापमान के कारण श्रम उत्पादकता में 10-15 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है, जबकि हीट स्ट्रोक और निर्जलीकरण के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि आजीविका और आर्थिक स्थिरता का भी सवाल है।

ग्रामीण भारत में यह संकट अलग रूप में, लेकिन समान तीव्रता के साथ मौजूद है। वर्षा के पैटर्न में अस्थिरता और तापमान में वृद्धि ने कृषि को अधिक अनिश्चित बना दिया है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री वृद्धि से गेहूँ की पैदावार में 6-7 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। सिंचाई के लिए भूजल पर बढ़ती निर्भरता ने लागत को बढ़ाया है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति और कठिन हो गई है। जब शहर अपने विस्तार और जरूरतों के लिए आसपास के क्षेत्रों से पानी खींचते हैं, तो ग्रामीण इलाकों में जल उपलब्धता और घटती है, जिससे यह संकट परस्पर जुड़ा हुआ रूप ले लेता है।

यहीं वह विरोधाभास उभरता है, जिसे नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है। एक ओर शहरों को ‘स्मार्ट’ और आधुनिक बनाने की योजनाएँ हैं-स्मार्ट सिटी मिशन, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर और ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार; दूसरी ओर उन्हीं शहरों में बुनियादी संसाधनों-खासतौर पर पानी और स्वच्छ हवा-की उपलब्धता चुनौती बनती जा रही है। विकास की गति और जीवन की गुणवत्ता के बीच यह असंतुलन एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करता है: क्या वर्तमान शहरीकरण मॉडल दीर्घकाल में टिकाऊ है? एक ओर निवेश और निर्माण की गति है, दूसरी ओर उन्हीं संरचनाओं के बीच रहने की परिस्थितियाँ कठिन होती जा रही हैं-यह द्वंद्व केवल नीतियों का नहीं, दृष्टिकोण का भी है।

जल प्रबंधन की स्थिति इस चुनौती को और जटिल बनाती है। देश में हर वर्ष औसतन लगभग 4000 अरब घन मीटर वर्षा जल प्राप्त होता है, लेकिन उसका केवल 15-20 प्रतिशत ही प्रभावी रूप से उपयोग में आ पाता है। शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अक्सर औपचारिकता भर रह जाती है, जबकि अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण की क्षमता भी सीमित है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, शहरी अपशिष्ट जल का लगभग 70 प्रतिशत बिना उपचार के ही नदियों और अन्य जल निकायों में चला जाता है। यह स्थिति संसाधन की बर्बादी के साथ-साथ पर्यावरणीय प्रदूषण को भी बढ़ाती है।

नागरिक व्यवहार भी इस पूरे परिदृश्य का एक अहम हिस्सा है। पानी के उपयोग में असावधानी, लीक होती पाइपलाइनें और संरक्षण के प्रति उदासीनता स्थिति को और गंभीर बनाती हैं। यदि बड़े शहरों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 10-15 लीटर पानी की भी बचत हो सके, तो सामूहिक रूप से इसका प्रभाव लाखों लीटर जल की बचत के रूप में सामने आ सकता है। लेकिन इसके लिए केवल अपील पर्याप्त नहीं, बल्कि जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन की सतत प्रक्रिया आवश्यक है।

इसके बावजूद, कुछ स्थानों पर सकारात्मक पहलें यह संकेत देती हैं कि विकल्प संभव हैं। कई शहरों में झीलों और तालाबों के पुनर्जीवन से भूजल स्तर में सुधार देखा गया है। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाने और हरित क्षेत्रों के संरक्षण के प्रयासों ने भी स्थानीय स्तर पर प्रभाव डाला है। हालांकि, इन प्रयासों का दायरा अभी सीमित है और इन्हें व्यापक स्तर पर अपनाने की जरूरत है।

वास्तव में, हीटवेव और जल संकट हमें यह पुनर्विचार करने का अवसर भी देते हैं कि विकास की हमारी परिभाषा क्या है। क्या विकास केवल भौतिक ढाँचों के विस्तार से मापा जाएगा, या उसमें पर्यावरणीय संतुलन और जीवन की गुणवत्ता भी शामिल होगी? यह प्रश्न केवल नीति-निर्माताओं के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए प्रासंगिक है।

ऐसे समय में आवश्यकता है कि शहरी नियोजन को संसाधनों की वास्तविक सीमाओं के साथ जोड़ा जाए। जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन के प्रभावी क्रियान्वयन, अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और हरित क्षेत्रों के विस्तार को प्राथमिकता देना केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बनता जा रहा है। साथ ही, नागरिक स्तर पर भी संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना जरूरी है। यह संकट हमें केवल चेतावनी ही नहीं देता, बल्कि यह भी संकेत करता है कि दिशा में परिवर्तन संभव है-यदि उसे समय रहते पहचाना और स्वीकार किया जाए।

(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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Author: speedpostnews

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