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डिजिटल संप्रभुता की ओर कदम

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अवनीश कुमार गुप्ता

वर्तमान युग को यदि डिजिटल युग कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने विश्व की आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं को परिवर्तित किया था, उसी प्रकार डिजिटल क्रांति आज वैश्विक शक्ति-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर रही है। राष्ट्रों की सामरिक शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक विकास अब केवल भौतिक संसाधनों पर निर्भर नहीं रह गए हैं, बल्कि डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड अवसंरचना, साइबर सुरक्षा तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी पर आधारित हो गए हैं। ऐसे परिवेश में “डिजिटल संप्रभुता” का प्रश्न केवल तकनीकी विमर्श का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व, सुरक्षा और स्वायत्तता से जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।

भारत ने पिछले दशक में डिजिटल क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, कोविन, ओएनडीसी तथा अन्य डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं ने न केवल देश के प्रशासनिक ढाँचे को अधिक सक्षम बनाया है, बल्कि करोड़ों नागरिकों को डिजिटल सेवाओं से जोड़कर समावेशी विकास का नया मॉडल प्रस्तुत किया है। आज भारत को डिजिटल नवाचार के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है। इसके बावजूद एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने उपस्थित है कि क्या भारत वास्तव में डिजिटल रूप से आत्मनिर्भर है? क्या हमारी महत्वपूर्ण डिजिटल संरचनाएँ हमारे नियंत्रण में हैं? और क्या भविष्य में किसी वैश्विक संकट अथवा भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में हम अपने डिजिटल हितों की रक्षा करने में सक्षम होंगे?

वास्तविकता यह है कि भारत की अनेक महत्वपूर्ण डिजिटल सेवाएँ अभी भी विदेशी तकनीकी मंचों, क्लाउड सेवाओं, ऑपरेटिंग प्रणालियों, सॉफ्टवेयर अवसंरचनाओं तथा सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर हैं। यह निर्भरता सामान्य परिस्थितियों में दिखाई नहीं देती, किंतु संकट की स्थिति में यही सबसे बड़ी कमजोरी सिद्ध हो सकती है। आज विश्व की अधिकांश क्लाउड सेवाएँ कुछ चुनिंदा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में हैं। डेटा का भौतिक रूप से भारत में संग्रहित होना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि डेटा को संचालित करने वाली तकनीक, उसके नियंत्रण तंत्र और उससे संबंधित कानूनी अधिकार अक्सर विदेशी संस्थाओं के पास होते हैं। परिणामस्वरूप भारतीय नागरिकों, संस्थानों और सरकार से संबंधित संवेदनशील सूचनाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से बाहरी प्रभाव बना रहता है।

डिजिटल निर्भरता का सबसे गंभीर प्रभाव राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। आधुनिक युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते। साइबर हमले, उपग्रह संचार, ड्रोन नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली और डिजिटल खुफिया तंत्र युद्धक रणनीति के अभिन्न अंग बन चुके हैं। यदि किसी राष्ट्र की रक्षा प्रणाली में प्रयुक्त सॉफ्टवेयर, संचार माध्यम अथवा चिप विदेशी नियंत्रण में हों, तो आपातकालीन परिस्थितियों में उनकी उपलब्धता और विश्वसनीयता दोनों संदिग्ध हो सकती हैं। आज युद्ध का एक बड़ा हिस्सा कोड, एल्गोरिद्म और नेटवर्क के माध्यम से संचालित होता है। इसलिए डिजिटल संप्रभुता राष्ट्रीय सुरक्षा का नया आधार बनती जा रही है।

भारत के लिए यह चुनौती इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि वह वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है। इतिहास बताता है कि उभरती हुई शक्तियों को स्थापित शक्तियों की तकनीकी और आर्थिक संरचनाओं पर निर्भर रहने की स्थिति में अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका और चीन डिजिटल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सबसे प्रभावशाली शक्तियाँ हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्लाउड कंप्यूटिंग और उन्नत डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर इन देशों का वर्चस्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ऐसे में भारत के लिए केवल उपभोक्ता बने रहना दीर्घकालिक दृष्टि से लाभकारी नहीं हो सकता।

डिजिटल संप्रभुता का अर्थ यह नहीं है कि कोई राष्ट्र स्वयं को वैश्विक तकनीकी व्यवस्था से अलग कर ले। इसका वास्तविक अर्थ है कि वह अपनी महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचनाओं, डेटा संसाधनों और रणनीतिक तकनीकों पर पर्याप्त नियंत्रण बनाए रखते हुए वैश्विक सहयोग में भागीदारी करे। आत्मनिर्भरता और वैश्विक सहभागिता के बीच संतुलन स्थापित करना ही डिजिटल संप्रभुता का मूल तत्व है।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका विशाल डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल है। आधार ने पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को सरल बनाया, यूपीआई ने वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी और डिजिलॉकर ने दस्तावेज़ प्रबंधन की अवधारणा को बदल दिया। इन पहलों ने यह सिद्ध किया है कि भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि नवाचार का सृजनकर्ता भी बन सकता है। यही अनुभव भारत को भविष्य की डिजिटल चुनौतियों का सामना करने की क्षमता प्रदान करता है।

फिर भी कुछ क्षेत्रों में गंभीर कमियाँ बनी हुई हैं। सेमीकंडक्टर उद्योग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था का प्रत्येक उपकरण चिप पर आधारित है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, वाहन, चिकित्सा उपकरण, रक्षा प्रणाली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संरचनाएँ—सभी सेमीकंडक्टर पर निर्भर हैं। भारत लंबे समय तक इस क्षेत्र में आयातक देश बना रहा है। हालाँकि हाल के वर्षों में घरेलू चिप निर्माण को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, किंतु वैश्विक प्रतिस्पर्धा के स्तर तक पहुँचने के लिए अभी लंबा मार्ग तय करना शेष है।

इसी प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी भारत को तेज़ी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। आज एआई केवल तकनीकी नवाचार का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक उत्पादकता, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव का प्रमुख उपकरण बन चुकी है। भारत के पास विशाल मात्रा में डेटा, कुशल मानव संसाधन और विशाल उपभोक्ता बाजार उपलब्ध है। यदि इन संसाधनों का समुचित उपयोग किया जाए तो भारत स्वदेशी एआई मॉडल, भारतीय भाषाओं के लिए उन्नत तकनीकी समाधान तथा वैश्विक स्तर की डिजिटल सेवाओं का विकास कर सकता है। इससे न केवल विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि नई आर्थिक संभावनाओं का भी सृजन होगा।

डिजिटल संप्रभुता की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाने की है। कोई भी राष्ट्र केवल तकनीकों का आयात करके तकनीकी महाशक्ति नहीं बन सकता। नवाचार, वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास ही स्थायी आत्मनिर्भरता का आधार हैं। भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, किंतु अनुसंधान पर व्यय अभी भी विकसित देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, उद्योगों और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के बीच अधिक प्रभावी सहयोग स्थापित करना समय की आवश्यकता है। जब तक ज्ञान का सृजन देश के भीतर नहीं होगा, तब तक तकनीकी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

इसके साथ ही डेटा शासन की स्पष्ट और संतुलित व्यवस्था भी आवश्यक है। डेटा आज के युग का सबसे मूल्यवान संसाधन माना जा रहा है। जिस प्रकार औद्योगिक युग में तेल और कोयला आर्थिक शक्ति के स्रोत थे, उसी प्रकार डिजिटल युग में डेटा और कंप्यूटिंग शक्ति नई सामरिक संपत्तियाँ हैं। भारत को ऐसी नीतियाँ विकसित करनी होंगी जो नागरिकों की गोपनीयता की रक्षा करते हुए नवाचार को प्रोत्साहित करें और राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखें।

भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा तकनीकी श्रेष्ठता पर आधारित होगी। जिन देशों के पास उन्नत एआई मॉडल, स्वदेशी चिप निर्माण क्षमता, मजबूत साइबर सुरक्षा तंत्र, विश्वसनीय क्लाउड अवसंरचना और उच्च स्तरीय अनुसंधान संस्थान होंगे, वही वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकेंगे। भारत के पास जनसांख्यिकीय शक्ति, तकनीकी प्रतिभा और विशाल बाजार जैसी अनेक विशेषताएँ हैं। आवश्यकता केवल इन्हें दीर्घकालिक रणनीति के साथ जोड़ने की है।

अंततः डिजिटल संप्रभुता कोई वैकल्पिक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है। यह आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक स्वायत्तता और वैश्विक प्रतिष्ठा से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि भारत आने वाले वर्षों में अनुसंधान, नवाचार, सेमीकंडक्टर निर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्रों में सुदृढ़ निवेश करने में सफल होता है, तो वह केवल डिजिटल सेवाओं का उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक डिजिटल व्यवस्था का निर्माता और नेतृत्वकर्ता बनकर उभरेगा। भारत के लिए चुनौती बड़ी है, किंतु अवसर उससे भी अधिक विशाल हैं। यही समय है जब देश को डिजिटल आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय रणनीति बनाकर तकनीकी स्वायत्तता की दिशा में निर्णायक कदम उठाने चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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Author: speedpostnews

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