जोहरान ममदानी के न्यूयार्क के मेयर बनने से पहले कितने लोग जानते होंगे कि संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय वाले इस शहर का मेयर कौन था। बहुत कम। यहां तक कि अधिकतर लोगों को यह भी मालूम नहीं होगा कि अमेरिका की 50 स्टेट के गवर्नर कौन हैं। 50 की बात छोड़िए, कोई किसी एक स्टेट के गवर्नर का नाम भी नहीं बता सकेगा। इनके नाम याद रखना जरूरी भी नहीं है। मुद्दे पर आता हूं। ममदानी का चुना जाना पूरे भारत के साथ दक्षिण एशिया के लिए गर्व की बात है। गौरव का विषय है। इस जीत पर दुनिया भर की निगाहें लगी थीं। वो इसलिए कि ट्रंप ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। वह ममदानी को हराने के लिए न्यूयार्क की जनता को धमका चुके थे, जैसा कि ट्रंप पहले भी कर चुके हैं। ट्रंप का यही धमकाने वाला रवैया उन पर भारी पड़ा। असल में यह ममदानी की जीत से बड़ी खबर इसलिए है कि ट्रंप को सोच और नीतियों के विरुद्ध अमेरिका की समझदार जनता ने वोट दिया। यह ममदानी की जीत कम, ट्रंप की के रवैये की हार ज्यादा है। यही अमेरिकी लोकतंत्र की खूबसूरती है।
अगले साल शायद ट्रंप को नोबेल से न रोक पाएं
इस बार ट्रंप इसलिए ज्यादा चर्चा में रहे, क्योंकि वे जैसे-तैसे नोबेल पुरस्कार चाह रहे थे। जिस भी देश में जाते या किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से चर्चा करते, उससे वादा जरूर लेते कि उनका देश उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करेगा। कई देशों ने ऐसा किया भी। पर इस पर उन्हें शांति का नोबेल नहीं दिया गया। इसका एक कारण यह भी बताया गया कि उनके नामांकन में देर हुई थी। ट्रंप अभी तक यह अभियान चलाए हुए हैं। जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री से भी उन्होंने यह वादा लिया है या किया है। इसका मतलब है कि ट्रंप अगले वर्ष भी नोबेल की दौड़ में होंगे। इतिहास गवाह कि दुनिया भर में एक युद्ध रोक चुके नेता नोबेल ले चुके हैं। ट्रंप तो एक से अधिक युद्ध रोकने में सीधे दखल दे चुके हैं। देशों को युद्ध रोकने के लिए धमका भी चुके हैं। इसलिए उनका नोबेल के लिए दावा आसानी से खारिज नहीं किया जा सकेगा।



