कांतिलाल मांडोत
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य सरकार और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी करना केवल एक कानूनी घटनाक्रम नहीं है, बल्कि यह भारतीय संघीय ढांचे, केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका और राज्यों की स्वायत्तता से जुड़े गहरे सवालों को सामने लाता है। अदालत की टिप्पणी कि यदि ऐसे मामलों में दखल नहीं दिया गया तो देश में अराजकता फैल सकती है, इस विवाद की गंभीरता को रेखांकित करती है।
पूरा मामला राजनीतिक रणनीति और कानूनी अधिकारों के टकराव का प्रतीक बन गया है। ईडी का आरोप है कि राजनीतिक परामर्श संस्था आई-पैक के कार्यालय और उसके सह-संस्थापक के आवास पर हुई तलाशी के दौरान जांच में बाधा डाली गई। इसी संदर्भ में पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ईडी अधिकारियों पर दर्ज एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी और तलाशी से जुड़े परिसरों के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्रीय एजेंसियां किसी राजनीतिक दल के चुनावी कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, लेकिन राजनीतिक दल भी वैध जांच में बाधा नहीं डाल सकते। यही संतुलन इस पूरे विवाद का मूल है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों ने इस मामले को और तीखा बना दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री स्वयं तलाशी स्थल पर पहुंचीं और वहां से फाइलें व ईडी अधिकारी का मोबाइल उठा लिया, जिसे उन्होंने चोरी की श्रेणी में बताया। उनका कहना था कि यदि ऐसे कृत्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा किए जाएंगे तो केंद्रीय एजेंसियों का मनोबल टूटेगा और राज्यों में कानून का शासन कमजोर पड़ेगा। वहीं, ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुनावी डेटा की सुरक्षा के लिए वहां गई थीं, न कि मुख्यमंत्री के रूप में। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि छापे की वीडियो रिकॉर्डिंग और ईडी के पंचनामे से यह स्पष्ट है कि कोई साक्ष्य नहीं उठाया गया।
यह टकराव केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदर्भ है। पश्चिम बंगाल में लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी शासित राज्यों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। तृणमूल कांग्रेस भी इसी तर्क को दोहराती रही है। दूसरी ओर, केंद्र का कहना है कि भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी द्वंद्व को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
अदालत की टिप्पणी कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने के कारण यदि जांच में बाधा डाली गई तो कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है, संघीय ढांचे की नाजुकता की ओर इशारा करती है। भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करता है, लेकिन जब जांच एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक रंग ले लेती है, तो यह विभाजन धुंधला हो जाता है। इस मामले में अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम के समानांतर चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण मुद्दा भी सामने आया है। निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान कक्षा 10 के प्रवेश पत्र को सत्यापन के लिए मान्य दस्तावेज मानने से इनकार कर दिया है। यह निर्णय तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन राजनीतिक रूप से इसके निहितार्थ व्यापक हैं। विपक्ष का आरोप है कि दस्तावेजों की सूची सीमित कर मतदाता सत्यापन को कठिन बनाया जा रहा है, जबकि आयोग का कहना है कि वह केवल निर्धारित नियमों का पालन कर रहा है।
इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल इस समय केवल राज्य स्तरीय राजनीति का मैदान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्थानों और संवैधानिक सिद्धांतों की परीक्षा का केंद्र बन चुका है। ईडी की कार्रवाई, पुलिस की प्रतिक्रिया, मुख्यमंत्री की भूमिका और अब निर्वाचन आयोग का निर्णय है।ये सभी मिलकर लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों के बीच संबंधों की जटिलता को उजागर करते हैं।
सबसे अहम प्रश्न यह है कि क्या जांच एजेंसियां पूरी तरह निष्पक्ष रह पा रही हैं और क्या राज्य सरकारें कानून के शासन का सम्मान कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका यहां निर्णायक हो जाती है। अदालत ने फिलहाल एफआईआर पर रोक लगाकर और नोटिस जारी कर यह संकेत दिया है कि वह तथ्यों की गहराई से जांच करेगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि अदालत ने किसी भी पक्ष को अभी दोषी नहीं ठहराया है, बल्कि संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
लोकतंत्र में टकराव स्वाभाविक है, लेकिन जब टकराव संस्थाओं के बीच हो, तो उसका समाधान भी संवैधानिक दायरे में ही होना चाहिए। ममता बनर्जी एक मजबूत जनादेश वाली मुख्यमंत्री हैं और केंद्र की एजेंसियां कानून के तहत काम करने का दावा करती हैं। ऐसे में टकराव का हल न तो सड़कों पर हंगामे से निकलेगा और न ही केवल राजनीतिक बयानबाजी से। इसका समाधान न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं के पालन में है।
आखिरकार, यह मामला केवल ईडी बनाम ममता का नहीं है। यह सवाल है कि भारत में संघीय ढांचा कितना मजबूत है, जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता कैसी है और लोकतांत्रिक संस्थाएं एक-दूसरे की सीमाओं का कितना सम्मान करती हैं। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई से उम्मीद की जा रही है कि वह न केवल इस विवाद का कानूनी समाधान देगी, बल्कि भविष्य के लिए भी एक स्पष्ट दिशा तय करेगी, ताकि कानून का शासन बना रहे और लोकतंत्र की नींव मजबूत हो।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं)
ईडी बनाम ममता; संघीय संतुलन, शासन और लोकतंत्र की कसौटी
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