कांतिलाल मांडोत
पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते घटनाक्रम ने पूरी दुनिया को एक बार फिर गहरे असमंजस और भय के दौर में ला खड़ा किया है। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया, बल्कि इसके वैश्विक परिणाम सामने आने लगे हैं। हाल ही में ईरान के वरिष्ठ नेता अली लारीजानी की कथित मौत, शीर्ष सैन्य अधिकारियों पर हमले, और लगातार हो रहे मिसाइल व ड्रोन हमलों ने इस संघर्ष को और अधिक खतरनाक बना दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि यह टकराव किसी भी समय व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका असर पूरी मानवता पर पड़ेगा।
इस युद्ध का सबसे बड़ा खतरा इसकी अनिश्चितता और तेजी से फैलने की क्षमता है। जब शक्तिशाली देश सीधे तौर पर आमने-सामने होते हैं, तो युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। तेल उत्पादन वाले क्षेत्र में संघर्ष होने के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर संकट गहराने से दुनिया भर में तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इससे ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आएगा, जिसका असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, खासकर विकासशील देशों पर, जहां पहले से ही महंगाई और बेरोजगारी बड़ी समस्या है।
खाद्य संकट भी इस युद्ध का एक गंभीर परिणाम बन सकता है। विश्व खाद्य कार्यक्रम पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो करोड़ों लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच सकते हैं। युद्ध के कारण आपूर्ति शृंखलाएं टूटती हैं, कृषि उत्पादन प्रभावित होता है और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। गरीब और कमजोर वर्ग सबसे पहले इसका शिकार बनते हैं, जिससे सामाजिक अस्थिरता और बढ़ जाती है।
मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो युद्ध हमेशा विनाश ही लाता है। हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। परिवार बिखर रहे हैं, बच्चे अनाथ हो रहे हैं और सामान्य जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। अस्पताल, स्कूल और बुनियादी ढांचे तबाह हो रहे हैं। ऐसे में आने वाली पीढ़ियों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है, क्योंकि वे हिंसा, भय और असुरक्षा के माहौल में बड़े होते हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी यह युद्ध दुनिया को दो खेमों में बांट सकता है। एक ओर अमेरिका और उसके सहयोगी देश हैं, तो दूसरी ओर ईरान और उसके समर्थक। यह विभाजन अंतरराष्ट्रीय सहयोग को कमजोर करता है और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका को सीमित कर देता है। जब संवाद और कूटनीति की जगह सैन्य कार्रवाई ले लेती है, तो समस्याओं का समाधान और कठिन हो जाता है।
इस संघर्ष का एक और खतरनाक पहलू यह है कि इसमें परमाणु शक्ति वाले देशों की अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष भागीदारी की आशंका बनी रहती है। यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो इसका परिणाम मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्ध के रूप में सामने आ सकता है। यही कारण है कि दुनिया भर के नेता और विशेषज्ञ इस युद्ध को तुरंत रोकने की अपील कर रहे हैं।
ईरान का कड़ा रुख और अमेरिका की सैन्य प्रतिक्रिया दोनों ही स्थिति को और भड़का रहे हैं। बयानबाजी, धमकियां और जवाबी हमले केवल तनाव को बढ़ाते हैं, समाधान नहीं देते। किसी भी युद्ध में जीत का कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता, क्योंकि अंततः नुकसान दोनों पक्षों का होता है। आर्थिक, सामाजिक और मानवीय क्षति इतनी बड़ी होती है कि उसकी भरपाई वर्षों तक नहीं हो पाती।
ऐसे समय में कूटनीति और संवाद ही एकमात्र रास्ता है। इतिहास गवाह है कि हर बड़े युद्ध का अंत बातचीत की मेज पर ही हुआ है। यदि शुरुआत में ही संवाद को प्राथमिकता दी जाए, तो लाखों जिंदगियों को बचाया जा सकता है। भारत जैसे देश, जो संतुलित विदेश नीति और शांति की वकालत करते हैं, इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। तटस्थ और विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में भारत जैसे देशों की भागीदारी इस संकट को कम करने में सहायक हो सकती है।
मीडिया और आम जनता की भी जिम्मेदारी है कि वे युद्धोन्माद को बढ़ावा देने के बजाय शांति की आवाज को मजबूत करें। युद्ध को महिमामंडित करने के बजाय उसके वास्तविक दुष्परिणामों को समझना और समझाना जरूरी है। जब तक समाज में शांति के प्रति जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक सरकारों पर भी दबाव नहीं बनेगा कि वे युद्ध के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं।
अंततः यह समझना होगा कि आधुनिक युग में युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह केवल नई समस्याओं को जन्म देता है। आज की दुनिया आपस में इतनी जुड़ी हुई है कि किसी एक क्षेत्र में होने वाला संघर्ष पूरे विश्व को प्रभावित करता है। इसलिए शांति केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
मानवता के हित में यही उचित होगा कि सभी पक्ष अपने अहंकार और राजनीतिक हितों को पीछे छोड़कर शांति की दिशा में कदम बढ़ाएं। युद्ध को रोकना ही सबसे बड़ी जीत होगी। यदि समय रहते यह निर्णय नहीं लिया गया, तो इसके परिणाम इतने भयावह हो सकते हैं कि पूरी दुनिया को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार व स्तम्भकार हैं)
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