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अंकों के जंगल में शिक्षा

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अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद्व

शिक्षा बोली-मैं चरित्र हूँ, विवेक हूँ, प्रकाश हूँ,
परीक्षा बोली-मैं अंक हूँ, रैंक हूँ, विशेष अधिकार हूँ।

विद्यालय के आँगन में दोनों का संवाद हुआ,
भविष्य बेचैन खड़ा था, वर्तमान नीलाम हुआ।

किताबें पूछ रही थीं, ज्ञान कहाँ खो जाता है,
जब हर उत्तर का मूल्य केवल अंक हो जाता है।

बच्चा विज्ञान नहीं, कटऑफ का सपना पढ़ता है,
प्रतिभा नहीं, प्रतियोगिता का जंगल चढ़ता है।

कोचिंग के महलों में बचपन गिरवी रखा है,
सफलता के विज्ञापन ने सत्य को ढँका रखा है।

डिग्रियों के अंबार लगे, कौशल फिर भी भूखा है,
कागज़ वाला ज्ञानी अक्सर जीवन में रूखा है।

कहते हैं-शिक्षा से राष्ट्र महान बन जाएगा,
पर नकल का व्यापारी भी सम्मान पा जाएगा।

शिक्षक का श्रम सिमटकर रिज़ल्ट में मापा जाता,
मानवता का अध्याय अक्सर पीछे छूट जाता।

कितने युवा अवसादों की गलियों में खो जाते,
कुछ अंक कम क्या आए, सपने तक रो जाते।

व्यंग्य यही है, मेधा का मूल्यांकन अधूरा है,
हर प्रतिभाशाली चेहरा सिस्टम से मजबूर है।

शिक्षा यदि प्रश्न जगाए, तभी समाज सँवरता है,
केवल परीक्षा लेने से कौन मनुष्य निखरता है?

ज़रूरत है ऐसी विद्या जो संवेदना सिखलाए,
रोज़गार के साथ-साथ नागरिक धर्म निभाए।

अंक नहीं, आचरण भी उपलब्धि का मान बने,
विद्यालय से निकलकर इंसान महान बने।

जिस दिन शिक्षा, परीक्षा पर अपना अधिकार करेगी,
उस दिन भारत की प्रतिभा सचमुच चमत्कार करेगी।

(कवि प्रयागराज, उत्तर प्रदेश से हैं)

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