साहिल शर्मा
हमने वोट दिया था,
चुप रहने का अनुबंध नहीं।
हमने उँगली पर स्याही लगाई थी,
ज़ुबान पर ताला लगाने के लिए नहीं।
सत्ता कहती है-
“सब्र रखो, समय लगेगा”
पर ये समय
हमारे हिस्से में ही क्यों गिरता है?
कुर्सियों की उम्र बढ़ती जाती है
और फ़ाइलों में
इंसाफ़ बूढ़ा क्यों हो जाता है?
जो पूछे, वो देशद्रोही,
जो चुप रहे, वो समझदार-
वाह रे लोकतंत्र!
यहाँ सच बोलना अपराध है
और झूठ की जय-जयकार।
स्कूल हैं,
पर संस्कार गुम हैं।
डिग्रियाँ हैं,
पर विवेक बेरोज़गार है।
हाथों में मोबाइल है,
पर आँखों पर पट्टी-
और इसे ही विकास कहा जा रहा है।
कर्मचारी इंतज़ार में मर रहा है,
प्रशासन “प्रक्रिया” ज़िंदा रखे हुए है।
गरीब की फ़ाइल धूल खा रही है
और अमीर का काम
“तत्काल सेवा” में निपट रहा है।
हम भगवान को मानते हैं,
पर सवाल करना भी जानते हैं।
क्योंकि आस्था अंधी हो जाए
तो बाबा भी बाज़ार बन जाते हैं
और श्रद्धा-
सिर्फ़ चंदा।
ये कविता नहीं,
एक चेतावनी है।
अगर चुप रहे,
तो वो भी सुरक्षित नहीं-
बस अगला नंबर है।
(पता : ग्राम बाहल अर्जुन, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश। संपर्क : 85447 05033)



