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न तख़्त चाहिए, न ताज

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साहिल शर्मा
मंचों से सपने बाँटे जाते हैं,
नीचे खड़े लोग फिर भी खाली लौट जाते हैं।

कहा जाता है-देश दिन-रात मेहनत कर रहा है,
सच ये है कि काम कुछ हाथों में सिमट रहा है।

एक कुर्सी पर बैठा आदमी
अठारह घंटे का तमगा पहनता है,
और लाखों बेरोज़गारों को
सब्र का पाठ पढ़ाता है।

अगर वक्त को ज़रा इंसाफ़ से बाँटा जाता,
तो हर दूसरे घर में चूल्हा जल जाता।

यहां मेहनत की मिसालें ऊपर से दी जाती हैं,
और नीचे भूख को आदत बताया जाता है।

रोटी सवाल करे तो आँकड़े थमा दिए जाते हैं,
हक़ माँगो तो क़ानून दिखा दिए जाते हैं।

जो बोले-वो उपद्रवी कहलाता है,
जो चुप रहे-वो समझदार कहलाता है।

किसान खेत में झुक कर भविष्य बोता है,
और सत्ता उसका वर्तमान गिरवी रख देती है।

मज़दूर की साँस सस्ती है इस व्यवस्था में,
क्योंकि मशीनें नहीं पूछती नाम आदमी के।

महँगाई को वैश्विक हवाओं पर टाल दिया गया,
गरीबी को संस्कार कह कर संभाल लिया गया।

अगर सत्ता सच में सेवा का नाम है,
तो सवाल पूछना सबसे बड़ा अपराध क्यों है?

न तख़्त का सपना है, न ताज की चाह,
बस ज़ुबान पर ताले न हों, पेट में आग न हो।

(कवि/शायर का पता : गांव बाहल अर्जुन, डाकघर चकमोह, तहसील धटवाल, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश
संपर्क : 85447 05033)

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Author: speedpostnews

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