साहिल शर्मा
अपने ही फ़ैसलों से मात खा जाते हैं हम,
जहाँ जीत लिखी हो-वहीं गँवा जाते हैं हम।
कदम सही होते हैं, राह भी साफ़ होती है,
फिर जाने किस वहम में भटक जाते हैं हम।
आईना जब सच कहे तो आँख चुरा लेते हैं,
अपनी ही नज़र से ख़ुद को छुपा जाते हैं हम।
हौसला साथ हो तो बाज़ी पलट सकती थी,
आख़िरी वक़्त पे ही क्यों थक जाते हैं हम।
क़सूर किस्मत का नहीं, ये मानना होगा,
अपने ही हाथों से घर जला जाते हैं हम।
जो हासिल था उसी को खो देने की आदत है,
मिलता है सब कुछ—फिर भी लुटा जाते हैं हम।
ये हार किसी और की साज़िश नहीं होती,
जहाँ जीत हमारी हो—वहीं हरा जाते हैं हम।
साहिल, शिकायत किससे करें अपने हाल की,
अपने ही फ़ैसलों से रोज़ मर जाते हैं हम।
(कवि/शायर हमीरपुर जिला के चकमोह क्षेत्र के बाहल अर्जुन गांव से हैं)
Author: speedpostnews
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