साहिल शर्मा
मैंने ज़िंदगी को
कभी किताब समझा था,
सोचा था—
जो लिखा है, वही होगा…
जो मिला है, वही सच है।
पर ज़िंदगी ने मुस्कुरा कर कहा—
“मैं पन्नों में नहीं समाती,
मैं तो उन मोड़ों में मिलती हूँ
जहाँ इंसान टूटता है…
और वहीं से बनना शुरू करता है।”
मैंने हार देखी,
ऐसी हार…
जिसमें हाथ खाली थे
और आँखों में सवाल।
दुनिया ने कहा—“बस यहीं तक था।”
लेकिन दिल ने फुसफुसाया—
“यहीं से तो शुरुआत है।”
क्योंकि अनुभव सिखाता है—
गिरना अंत नहीं,
गिरने के बाद उठना ही असली जीत है।
मैं भीड़ में रहा,
तालियों के बीच खड़ा रहा…
फिर भी भीतर कहीं
एक सन्नाटा बोलता रहा।
कुछ रिश्ते पास होकर भी दूर थे,
कुछ दूर होकर भी अपने थे।
तभी समझ आया—
रिश्ते नाम से नहीं,
अहसास से जिंदा रहते हैं।
कभी-कभी अकेलापन
कमज़ोरी नहीं होता,
कभी-कभी वही
खुद से मिलने का रास्ता होता है।
मैंने समय से लड़ना चाहा,
पर समय ने मुझे
रुकना सिखाया।
कहा—
“हर दौड़ जीत नहीं होती,
और हर ठहराव हार नहीं होता।”
तब जाना…
धैर्य वो कला है
जो तूफ़ान में भी
दिल को स्थिर रखती है।
मैंने सपनों को टूटते देखा,
बिखरते देखा…
और उन्हीं टुकड़ों से
फिर नए सपने बनते भी देखे।
क्योंकि ज़िंदगी ये नहीं पूछती
कि तू कितनी बार गिरा,
ज़िंदगी बस ये देखती है
कि तू हर बार उठा या नहीं।
लोगों ने पूछा—
“तेरी सफलता क्या है?”
मैंने कहा—
मेरी सफलता वो नहीं
जो मंच पर चमके,
मेरी सफलता वो है
जो रात को मुझे सुकून से सुला दे।
अगर मैं खुद से नज़र मिला सकूँ,
अगर आईने में खड़ा इंसान
मुझे शर्मिंदा न करे…
तो समझ लेना—
मैं सफल हूँ।
क्योंकि असली जीत
दूसरों से आगे निकलना नहीं,
असली जीत है—
खुद के भीतर के डर से आगे निकलना।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो अपनी हर ठोकर
एक शिक्षक लगती है,
हर आँसू
एक पाठ बन जाता है,
और हर दर्द
मेरी पहचान बन जाता है।
तब दिल से एक ही आवाज़ आती है—
जीवन कोई तैयार कहानी नहीं है,
जीवन वो अनुभव है…
जो हर दिन हमें गढ़ता है।
और इसलिए मैं कहता हूँ—
अनुभव ही जीवन है…
न पद, न पैसा, न नाम,
बल्कि वो राह…
जिस पर चलते-चलते
इंसान खुद को पा जाता है।



