कांतिलाल मांडोत, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार व स्तंभकार
मोबाइल स्क्रीन की चमक में बचपन कब कैद हो गया, इसका अंदाज़ा शायद हमें तब हुआ जब खेल के मैदान सूने और बच्चों की उंगलियाँ लगातार स्क्रीन पर चलती दिखीं। जिस तकनीक को ज्ञान, संवाद और अवसर का माध्यम माना गया, वही धीरे-धीरे बच्चों और किशोरों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बनती जा रही है। यही कारण है कि दुनिया के कई देश अब डिजिटल आज़ादी पर अंकुश लगाने का साहसिक फैसला कर रहे हैं। फ्रांस का ताज़ा कदम इसी वैश्विक चेतना का हिस्सा है, जिसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब पश्चिमी देश अपने बच्चों को स्क्रीन की गिरफ्त से निकालने के लिए सख्त कानून बना रहे हैं, तब भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में यह मुद्दा अब भी प्राथमिकता क्यों नहीं बन पाया है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने नए साल के संदेश में साफ संकेत दिए कि सरकार बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया और स्क्रीन की बढ़ती लत से बचाने के लिए निर्णायक कदम उठाने जा रही है। प्रस्तावित ड्राफ्ट के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच सीमित करने, 15 से 18 साल के किशोरों के लिए डिजिटल कर्फ्यू जैसे उपाय और स्कूलों में मोबाइल प्रतिबंध को हाई स्कूल स्तर तक बढ़ाने की तैयारी है। यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जिसमें राज्य यह मानता है कि बच्चों की मानसिक सेहत और भविष्य बाजार की ताकतों से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम बच्चों को उसी तरह लत की ओर धकेलते हैं, जैसे कभी तंबाकू या नशे की अन्य चीजें किया करती थीं। लाइक, शेयर और नोटिफिकेशन का अदृश्य दबाव बच्चों के आत्मसम्मान को बाहरी स्वीकृति से जोड़ देता है। साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ट्रोलिंग, फर्जी स्कीम, आर्थिक ठगी और यौन शोषण जैसे खतरे उनकी मासूम दुनिया में गहरी दरार डाल रहे हैं। जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में गिरावट और अकेलेपन को जन्म दे रहा है। पश्चिमी देशों ने इस खतरे को समय रहते पहचाना और अब वे कानून के जरिए हस्तक्षेप कर रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया ने तो 16 साल से कम उम्र के यूजर्स के सोशल मीडिया अकाउंट डिएक्टिवेट करने जैसे सख्त नियम लागू कर दिए हैं। इटली और डेनमार्क उम्र सत्यापन पर जोर दे रहे हैं। स्पेन और ग्रीस अनिवार्य उम्र सीमा तय करने की तैयारी में हैं। मलेशिया बच्चों और किशोरों की सुरक्षा के लिए नए कानून लाने पर विचार कर रहा है। इन देशों में यह बहस अब खत्म हो चुकी है कि नियंत्रण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है या नहीं। वहां प्राथमिकता साफ है।बच्चों का भविष्य।
इसके उलट भारत की स्थिति चिंताजनक है। यहां स्मार्टफोन तेजी से हर हाथ तक पहुंचा, लेकिन उसके साथ आने वाले खतरे को लेकर न तो व्यापक सामाजिक चेतना बनी और न ही ठोस सरकारी नीति। डिजिटल इंडिया के नारे के साथ इंटरनेट गांव-गांव पहुंचा, यह उपलब्धि है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने इसके सामाजिक परिणामों के लिए तैयारी की। ऑनलाइन क्लास के नाम पर बच्चों के हाथ में मोबाइल पकड़ा दिया गया और फिर धीरे-धीरे वही मोबाइल मनोरंजन, गेमिंग और सोशल मीडिया का स्थायी माध्यम बन गया। अभिभावक व्यस्तता और असुरक्षा के कारण बच्चों को स्क्रीन के हवाले करते चले गए।
भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा, परिवार का संवाद, खेल और सामूहिक जीवन को हमेशा महत्वपूर्ण माना गया है। बचपन को संस्कारों की नींव कहा गया। लेकिन आज विडंबना यह है कि हम उसी संस्कृति की अहम बातों को गौण मानकर पश्चिमी डिजिटल जीवनशैली की नकल में लगे हैं। पश्चिम, जिसने कभी असीम स्वतंत्रता का पक्ष लिया था, आज उसी स्वतंत्रता पर नियंत्रण की जरूरत महसूस कर रहा है, जबकि भारत बिना सोचे-समझे उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।
यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि भारत में बच्चों के लिए सरकार की नीतियां वरदान क्यों नहीं बन पा रहीं। शिक्षा नीति में डिजिटल साक्षरता की बात होती है, लेकिन डिजिटल अनुशासन पर चुप्पी है। आईटी कानून और बाल संरक्षण कानून अलग-अलग दिशाओं में चलते दिखते हैं। सोशल मीडिया कंपनियों पर उम्र सत्यापन और एल्गोरिदम की जवाबदेही को लेकर सख्ती का अभाव है। अभिभावकों पर जिम्मेदारी डालकर सरकार अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकती, क्योंकि जब बाजार और तकनीक इतनी शक्तिशाली हो जाए, तब केवल व्यक्तिगत नियंत्रण पर्याप्त नहीं होता।
पश्चिमी सभ्यता में एक बड़ा बदलाव यह दिख रहा है कि वहां सरकारें अब बिग टेक से टकराने का साहस कर रही हैं। वे मान रही हैं कि मुनाफे की दौड़ में बच्चों की सेहत कुर्बान नहीं की जा सकती। भारत में उल्टा दृश्य है। यहां तकनीक को विकास का पर्याय मान लिया गया है और उससे जुड़े सामाजिक प्रश्नों को विकास विरोधी बताकर किनारे कर दिया जाता है। जबकि सच यह है कि बिना संतुलन के विकास विनाश का रास्ता बन जाता है।
आज जरूरत है कि भारत भी इस बहस को गंभीरता से ले। बच्चों के लिए उम्र आधारित सोशल मीडिया प्रतिबंध, स्कूलों में मोबाइल के उपयोग पर सख्त नियम, रात के समय डिजिटल कर्फ्यू और प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट फिल्टर जैसे कदम अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं। साथ ही अभिभावकों और शिक्षकों को भी जागरूक करना होगा कि तकनीक का उपयोग साधन के रूप में हो, लक्ष्य के रूप में नहीं।
भारत की ताकत उसकी युवा आबादी है। लेकिन अगर यही युवा बचपन से ही स्क्रीन की लत, आभासी तुलना और डिजिटल तनाव में फंसे रहेंगे तो यह जनसांख्यिकीय लाभ बोझ में बदल सकता है। फ्रांस और अन्य देशों के कदम हमें चेतावनी दे रहे हैं कि समय रहते निर्णय नहीं लिए गए तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
शायद अब वक्त आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि हर आधुनिक चीज प्रगति नहीं होती और हर परंपरा पिछड़ापन नहीं होती। भारतीय संस्कृति ने हमेशा संतुलन सिखाया है।अति से बचने का संदेश दिया है। अगर सरकार, समाज और परिवार मिलकर इस संतुलन को डिजिटल दुनिया में भी लागू करें, तभी तकनीक बच्चों के लिए अभिशाप नहीं, सच में वरदान बन सकेगी।
(पता : कांतिलाल मांडोत, L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत, गुजरात। फोन नंबर 99749 40324)



