राजीव डोगरा
आखिर मैं ही क्यों
दबी कुचली रहूं इस समाज में
क्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं ?
आखिर मैं ही क्यों
अपनी पीड़ा को अंतर मन में रखूँ
क्या मेरी संवेदनाओं का कोई वजूद नहीं?
आखिर मैं ही क्यों
कुंठित व्यक्तित्व झेलूं लोगों का
क्या मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं?
आखिर मैं ही क्यों
जियों और लोगों के लिए
क्या मेरे जीवन की कोई ‘हस्ती’ नहीं?
आखिर मैं ही क्यों
दिन-रात उत्पीड़ना सहन करूं
क्या मुझे स्वयं खुश रहने का अधिकार नहीं?
युवा कवि लेखक और भाषा अध्यापक
पता-गांव जनयानकड़
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कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
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Author: speedpostnews
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