-वैशाली गुलेरिया, बल्ह, मंडी
सुना है यह जग कहता है, समझदारी से चलना, जितनी हो चादर तेरी, बस उतने ही पैर पसारना। यह सीख बताती है डर, यह सिखाती है संकोच, कि जो मिला है उसी में रह, न करना तू बड़ी सोच।
पर मैं कहती हूँ, ये कैसी मजबूरी की बात है! क्यों पैर समेटें हम, जब उड़ानें छूना हमारी घात है? अगर चादर छोटी पड़ रही, तो क्यों न उसे बुना जाए, क्यों न प्रयास की सुइयों से, नया विस्तार चुना जाए!
यह जीवन नहीं ठहरने को, यह तो है बहता नीर, पैर क्यों दबाकर बैठें, जब छूना है हर तीर। निश्चित ही है बुद्धिमानी, संसाधनों को पहचानना, पर है महानता उन साधनों को, अपनी लगन से बढ़ाना।
पैर तो खुलेंगे पूरे, जब सपने होंगे विशाल, ज़रूरत पड़े तो बुन लेंगे, चादर नई हर हाल। ये डर की चादरें पुरानी, इन्हें अब हटाना होगा, अपने पुरुषार्थ के धागों से, आसमान को सजाना होगा।
तो मत स्वीकारो सीमा को, मत बनो तुम मजबूर, संकल्प से बड़ा करो चादर, फैलाओ उसे दूर-दूर। क्योंकि जीवन की कहानी, पैर पसारने से नहीं चलती, यह तो चादर बड़ी करने के ज़ज्बे से बदलती है…..



