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उत्तर प्रदेश के कासगंज में चूना-गुड़ के मिश्रण से बनाया गया 140 साल पुराना पुल आज भी पूरी तरह सुरक्षित

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उत्तर प्रदेश में ऐसा एक पुल है, जिसे आपने “झाल पुल” कहा है, असल में यह नदरई पुल (Nadrai Ka Pul) है, जिसे “झाल ब्रिज” भी कहा जाता है। यह कासगंज, उत्तर प्रदेश में स्थित है।

यहां इस पुल की कुछ अहम बातें:

इतिहास और विशेषताएं

1. निर्माण काल

इस पुल का निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ था, 1885–1889 के बीच।

कांसेप्ट डिजाइन आयरलैंड के एक इंजीनियर विलियम गुड ने किया था।

2. संरचना

यह पुल गंगा नहर (हजारा नहर) और काली नदी के ऊपर बनाया गया है — यानी, नीचे नदी है और ऊपर से नहर गुजरती है।

इसकी लंबाई लगभग 346 मीटर है।

निर्वहन क्षमता (discharge capacity) लगभग 7095 क्यूसेक बताई जाती है।

पुल में लगभग 15 मेहराब (arches) हैं।

इसके स्तंभ (पिलर) ईंटों से बने हैं, और आधुनिक कंक्रीट का इस्तेमाल नहीं हुआ है।

इसमें “कोठरियाँ” (small chambers/small rooms) और “सुरंग मार्ग” (tunnels) भी हैं, जिन्हें “चोर कोठरियाँ” कहा जाता है।

3. नवीनता और इंजीनियरिंग चमत्कार

यह पुल लोहे (iron) का इस्तेमाल बहुत कम या न के बराबर करके बनाया गया है, खासकर मेहराब संरचना में, जो इसे इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से अनूठा बनाता है।

चूना-गुड़ मिश्रण (lime-sugar mixture) के साथ ईंटों को जोड़कर यह पुल बनाया गया था, जो तब के समय में एक परंपरागत निर्माण तकनीक थी।

इस पुल की मजबूती आज भी बनी हुई है, और इसे इरिगेशन विभाग की ऐतिहासिक संरचना माना जाता है।

विदेशी विश्वविद्यालय (जैसे अमेरिका, आयरलैंड) में सिविल इंजीनियरिंग के छात्रों द्वारा इस पुल का अध्ययन किया जाता है।

4. पर्यटन और महत्व

यह एक पिकनिक-स्पॉट की तरह भी लोकप्रिय है क्योंकि इसका दृश्य बहुत खास है — नीचे से नदी बहती है, ऊपर से नहर, साथ में पुरानी चोर-कोठरियाँ।

जिला प्रशासन ने इसके आसपास पार्क की भी योजना बनाई है ताकि पर्यटक और स्थानीय लोग इसे देख सकें और उसका आनंद ले सकें।

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Author: speedpostnews

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