क्रिकेट के शुरुआती दौर (18वीं सदी) में गेंदबाजी स्वाभाविक रूप से अंडर-आर्म ही होती थी।
धीरे-धीरे खिलाड़ियों ने राउंड-आर्म और फिर ओवर-आर्म गेंदबाजी शुरू की, और इन्हें वैध मान लिया गया।
लेकिन अंडर-आर्म बॉलिंग पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं हुई थी, सिर्फ कम ही उपयोग होती थी।
विवादित घटना (1981)
1 फरवरी 1981 को मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया बनाम न्यूज़ीलैंड, वनडे मैच) में बड़ा विवाद हुआ।
स्थिति: न्यूज़ीलैंड को आखिरी गेंद पर 6 रन चाहिए थे मैच टाई करने के लिए।
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ग्रेग चैपल (Greg Chappell) ने अपने भाई गेंदबाज ट्रेवर चैपल (Trevor Chappell) को कहा कि वह आखिरी गेंद अंडर-आर्म फेंके।
गेंद अंडर-आर्म फेंकी गई और बल्लेबाज छक्का नहीं मार सका।
मैच ऑस्ट्रेलिया जीत गया, लेकिन इस घटना को पूरी दुनिया में स्पोर्ट्समैनशिप के खिलाफ (against the spirit of the game) माना गया।
नियम में बदलाव
इस विवाद के बाद क्रिकेट बोर्ड और ICC (अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद) पर भारी दबाव पड़ा।
नतीजतन 1981 के उसी साल अंडर-आर्म बॉलिंग को सीमित ओवरों के अंतर्राष्ट्रीय मैचों (ODI और T20 जैसे प्रारूप) में प्रतिबंधित कर दिया गया।
बाद में यह नियम सभी तरह के क्रिकेट (टेस्ट सहित) पर लागू कर दिया गया।
आज का नियम
अब अंडर-आर्म गेंदबाजी पूरी तरह से निषिद्ध (illegal) है।
अगर कोई गेंदबाज जानबूझकर अंडर-आर्म फेंकता है तो उसे नो-बॉल करार दिया जाता है और अम्पायर कार्रवाई कर सकते हैं।
यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि 1981 में ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड मैच में अंडर-आर्म बॉलिंग का इस्तेमाल जीत के लिए किया गया था, जो खेल भावना के खिलाफ था।



