श्री कोणार्क सूर्य मंदिर (ओडिशा) न केवल अपनी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके चुंबकीय शक्ति से जुड़े किस्से और वैज्ञानिक कारण भी चर्चा में रहते हैं।
1. मंदिर का निर्माण और चुंबकीय शक्ति
यह 13वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया था।
मंदिर का मुख्य शिखर (अब खंडित) लगभग 70 मीटर ऊँचा था।
शिखर पर एक विशाल चुंबकीय लौह-पत्थर (lodestone) रखा गया था, जो पूरे ढांचे के लोहे के जोड़ों को चुंबकीय आकर्षण से जोड़ने में मदद करता था।
मंदिर में प्रयुक्त पत्थरों के बीच लोहे की पत्तियाँ (iron plates) लगाई गई थीं, जिससे संरचना को मजबूती मिलती थी।
2. चुंबकीय शक्ति का प्रभाव
कहा जाता है कि शिखर का बड़ा चुंबक समुद्र से गुजरने वाले जहाजों के कंपास को प्रभावित करता था।
यह चुंबकीय विक्षोभ नाविकों के दिशा-निर्देशन में बाधा डालता था, जिससे नाविक इस क्षेत्र से सावधानी से गुजरते थे।
स्थानीय किंवदंती है कि विदेशी आक्रमणकारियों ने इस पत्थर को निकाल लिया, जिससे मंदिर की संरचना कमजोर होकर धीरे-धीरे ढह गई।
3. वैज्ञानिक कारण
चुंबकत्व का स्रोत मंदिर के निर्माण में उपयोग हुआ lodestone था, जो स्वाभाविक रूप से चुंबकीय खनिज (मैग्नेटाइट – Fe₃O₄) होता है।
समुद्र की नमी और हवा में मौजूद लवण ने लोहे के साथ विद्युत-रासायनिक क्रिया को बढ़ाया, जिससे चुंबकीय क्षेत्र और मजबूत हो सकता था।
जब इतने बड़े आकार का lodestone ऊँचाई पर लगाया गया, तो उसका चुंबकीय क्षेत्र कई सौ मीटर तक महसूस किया जा सकता था।
4. अन्य विशेषताएँ
मंदिर को सूर्य रथ के रूप में बनाया गया है, जिसमें 12 जोड़ी अलंकृत पत्थर के पहिये और 7 घोड़े हैं।
पहियों की नक्काशी न केवल कला का अद्भुत नमूना है, बल्कि वे समय बताने वाले सूर्य घड़ी (Sun Dial) का भी काम करते हैं।
मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार सूर्योदय की दिशा में है, ताकि सुबह की पहली किरण सीधे सूर्य देव की मूर्ति पर पड़े।
5. केवल किंवदंती नहीं
कोणार्क सूर्य मंदिर की चुंबकीय शक्ति केवल किंवदंती नहीं, बल्कि प्राचीन इंजीनियरिंग और खनिज विज्ञान का परिणाम थी। प्राचीन शिल्पकारों ने न केवल वास्तुकला, बल्कि प्राकृतिक चुंबकीय पत्थरों और धातुओं का उपयोग करके एक ऐसा अद्भुत संरचना बनाई, जो आज भी रहस्यमयी और प्रेरणादायक है।



