Home » दुनिया रंग-बिरंगी » पांगी के मिंधल गांव में एक बैल से होती है खेती; इसके पीछे मां काली के श्राप की मान्यता, संकरे खेत भी इसका कारण

पांगी के मिंधल गांव में एक बैल से होती है खेती; इसके पीछे मां काली के श्राप की मान्यता, संकरे खेत भी इसका कारण

Facebook
Twitter
WhatsApp

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित पांगी घाटी अपनी दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है। इस घाटी का मिंधल गांव भी अपनी विशिष्ट कृषि पद्धति के कारण चर्चा में रहता है। यहां खेती करने का तरीका अन्य इलाकों से अलग है क्योंकि यहां हल जोतने के लिए केवल एक बैल का उपयोग किया जाता है। आमतौर पर भारत के अधिकांश हिस्सों में हल चलाने के लिए दो बैलों की जोड़ी इस्तेमाल की जाती है, लेकिन मिंधल में एक बैल से ही यह काम लिया जाता है।

एक मान्यता श्री मिंधल माता से भी जुड़ी है
बताया जाता है कि पांगी के मिंधल गांव में एक घुंगती नाम की बुढ़िया रहती थी। उसके सात पुत्र थे। बुढ़िया माता काली की उपासक थी। एक दिन बुढ़िया के सपने में माता आई और उसके घर प्रकट होने की इच्छा जताई। सुबह जब बुढ़िया जागी तो चूल्हे में काले पत्थर की शिला देखी। बुढ़िया ने राख से शिला को ढक दिया। यह सिलसिला छह दिन चला। शिला निकलती और बुढ़िया उसे ढक देती। सातवें दिन मां काली की शिला घर की छत से बाहर निकल जाती है। वर्तमान में माता का मंदिर इसी घर में स्थापित है। बुढ़िया के सातों बेटे बैलों से खेती करने गए थे। माता ने उन्हें बुलाया पर वे नहीं आए। माता ने श्राप देकर उन्हें पत्थर का बना दिया और साथ में यह श्राप भी दिया कि अब मिंधल गांव में एक बैल से ही खेती हुआ करेगी। तब से इस गांव में एक बैल से ही खेती होती चली आ रही है।

ऐसा क्यों किया जाता है
मिंधल गांव ऊंचे पहाड़ों और संकरी घाटियों के बीच बसा हुआ है। यहां की जमीन समतल नहीं है, बल्कि ढलानदार और पथरीली है। पारंपरिक दो बैलों वाले हल से इस इलाके में खेती करना कठिन हो जाता है, क्योंकि खेतों में जगह कम होती है और ढलानों पर दो बैल नियंत्रित करना मुश्किल होता है। इसलिए यहां के किसान एक बैल से ही हल चलाते हैं, जिससे वे तंग जगहों पर भी आसानी से खेती कर पाते हैं।

एक बैल से खेती की परंपरा
इस पद्धति को यहां के किसान पीढ़ियों से अपनाते आ रहे हैं। हल को खास तरीके से बनाया जाता है ताकि एक ही बैल इसे खींच सके। किसान हल को खुद संभालते हैं और बैल को नियंत्रित करने के लिए विशेष कमानियों का प्रयोग करते हैं। यह तकनीक कठिन तो है, लेकिन यहां के लोग इसमें निपुण होते हैं।

खेतों की विशेषता
मिंधल गांव में छोटे-छोटे खेत होते हैं, जिनमें जौ, राजमा, मक्का और आलू जैसी फसलें उगाई जाती हैं। इन खेतों की मिट्टी उपजाऊ होती है, लेकिन ठंडे मौसम के कारण यहां खेती का समय सीमित होता है। किसान जून से सितंबर के बीच फसल उगाते हैं और बाकी महीनों में बर्फबारी के कारण कृषि कार्य रुक जाता है।

आधुनिक खेती की चुनौतियां
आजकल जब मशीनों और आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है, तब भी मिंधल के किसान पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं। हालांकि, युवा पीढ़ी अब नए तरीके अपनाने की ओर बढ़ रही है। ट्रैक्टर और अन्य मशीनें लाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन कठिन भौगोलिक स्थिति के कारण यह आसान नहीं है।

संरक्षण और परंपरा का संतुलन
एक बैल से खेती करने की यह परंपरा मिंधल की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बन चुकी है। हालांकि, यह तरीका धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है क्योंकि नई पीढ़ी इसके प्रति कम रुचि दिखा रही है। यदि इस अनूठी कृषि पद्धति को संरक्षित करना है, तो सरकार और स्थानीय प्रशासन को किसानों की मदद के लिए कदम उठाने होंगे।

इस प्रकार मिंधल गांव में एक बैल से हल चलाने की यह अनोखी परंपरा कठिनाइयों के बावजूद जारी है और यह दर्शाती है कि किस तरह मनुष्य अपनी परिस्थितियों के अनुरूप कृषि तकनीकों को विकसित कर सकता है।

speedpostnews
Author: speedpostnews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *