Home » साहित्य जगत/ब्लाग » सड़क सुरक्षा नियमों से ही संभव नहीं

सड़क सुरक्षा नियमों से ही संभव नहीं

Facebook
Twitter
WhatsApp

 

अवनीश कुमार गुप्ता
भारत में सड़क दुर्घटनाएँ अब केवल यातायात व्यवस्था की समस्या नहीं रह गई हैं। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्रशासनिक क्षमता, शहरी नियोजन, वाहन तकनीक और नागरिक संस्कृति की संयुक्त परीक्षा बन चुकी है। विडंबना यह है कि जिस देश में सड़कें आर्थिक विकास की जीवनरेखा हैं, उन्हीं सड़कों पर हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग असमय मृत्यु का शिकार होते हैं। भारत के पास दुनिया के कुल वाहनों का लगभग एक प्रतिशत होने के बावजूद वैश्विक सड़क यातायात मौतों में उसकी हिस्सेदारी करीब 11 प्रतिशत बताई जाती है। यह आंकड़ा केवल दुर्घटनाओं की भयावहता नहीं बताता, बल्कि उस व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है, जिसमें सड़क पर निकलना आज भी अनेक लोगों के लिए जोखिम भरा है।

हाल में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने सड़क परिवहन मंत्रालय से उस याचिका पर विचार करने को कहा है, जिसमें सीट बेल्ट, हेलमेट और बच्चों के लिए सुरक्षा उपकरणों के नियमित इस्तेमाल को बढ़ावा देकर सड़क मृत्यु कम करने की मांग की गई है। न्यायिक पहल का अपना महत्व है। जब प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षित गति से काम न करे, तब न्यायपालिका नागरिक जीवन के संवैधानिक मूल्य की ओर शासन का ध्यान आकर्षित कर सकती है। लेकिन सड़क सुरक्षा जैसी जटिल समस्या का स्थायी समाधान केवल न्यायिक आदेशों से संभव नहीं है। अदालत दिशा दिखा सकती है, सरकार नीति बना सकती है और पुलिस कानून लागू कर सकती है, लेकिन सुरक्षित सड़क संस्कृति तभी विकसित होगी जब पूरी परिवहन व्यवस्था इस धारणा पर आधारित हो कि मनुष्य से गलती होगी और व्यवस्था को उस गलती की कीमत जीवन से नहीं चुकवानी चाहिए।

सीट बेल्ट और हेलमेट सड़क सुरक्षा के सबसे बुनियादी सुरक्षा उपकरण हैं। दुर्घटना के बाद की जांचों में कई बार सामने आया है कि सीट बेल्ट न लगाने से लोग वाहन से बाहर जा गिरे अथवा वाहन के भीतर किसी कठोर हिस्से से टकराकर गंभीर रूप से घायल हुए। बच्चों के मामले में खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि पिछली सीट पर सुरक्षा बेल्ट तथा बाल-सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल अभी पर्याप्त नियमित नहीं है। अचानक ब्रेक या टक्कर की स्थिति में बच्चे का शरीर अधिक असुरक्षित होता है। इसलिए सीट बेल्ट को केवल पुलिस के डर या चालान से बचने का साधन मानना उसके वास्तविक उद्देश्य को छोटा कर देना है। यह जीवन और मृत्यु के बीच एक साधारण लेकिन निर्णायक सुरक्षा-कवच है।

फिर भी केवल सीट बेल्ट और हेलमेट के बेहतर पालन से भारत की सड़क मृत्यु की समस्या हल नहीं हो सकती। 2024 के आंकड़ों के अनुसार सड़क मृत्यु में दोपहिया वाहन चालकों की हिस्सेदारी 46.2 प्रतिशत और पैदल यात्रियों की 20.6 प्रतिशत थी। इसका अर्थ है कि सड़क सुरक्षा की बहस को कारों के भीतर बैठे यात्रियों तक सीमित करना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। सड़क पर मरने वालों का बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जो वाहन के बाहर हैं। इसलिए सुरक्षा की दृष्टि को वाहन से निकालकर पूरी सड़क व्यवस्था तक विस्तृत करना होगा।

दूसरी बड़ी चुनौती तेज गति है। गति दुर्घटना की संभावना बढ़ाने के साथ दुर्घटना होने पर उसके परिणामों की गंभीरता भी बढ़ाती है। एक ही मानवीय भूल कम गति पर मामूली क्षति का कारण बन सकती है और अत्यधिक गति पर मृत्यु का। इसलिए गति प्रबंधन को सड़क सुरक्षा नीति के केंद्र में रखना होगा। केवल चालान काटना पर्याप्त नहीं है। ऐसी सड़कें, संकेत, निगरानी तंत्र और यातायात व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी जो चालक को सुरक्षित गति बनाए रखने के लिए प्रेरित करें। दुर्घटना के बाद दंड देना व्यवस्था की अंतिम सीढ़ी है; दुर्घटना से पहले जोखिम कम कर देना कहीं अधिक प्रभावी प्रशासन है।

यहीं ‘सेफ सिस्टम’ दृष्टिकोण की आवश्यकता सामने आती है। इसका मूल विचार सरल लेकिन दूरगामी है—मनुष्य पूर्ण नहीं है, इसलिए सड़क व्यवस्था को मानवीय भूल की संभावना को स्वीकार करते हुए बनाया जाए। चालक थक सकता है, ध्यान भटका सकता है, गति का गलत अनुमान लगा सकता है या अचानक निर्णय लेने में चूक सकता है। पैदल यात्री भी गलती कर सकता है। प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि गलती किसने की; प्रश्न यह होना चाहिए कि गलती के बाद व्यवस्था ने व्यक्ति को मरने से बचाने के लिए क्या किया।

इस दृष्टिकोण में सड़क को केवल डामर की पट्टी नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सुरक्षा-तंत्र माना जाता है। दुर्घटना-प्रवण स्थानों की पहचान, उनका वैज्ञानिक सुधार, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, स्पष्ट संकेत, सुरक्षित पैदल-पारपथ, उचित डिवाइडर, नियंत्रित गति और ऐसी सड़क संरचना आवश्यक है जो मानवीय भूल के प्रभाव को कम कर सके। जिस मोड़ पर बार-बार दुर्घटनाएँ हो रही हों, वहाँ केवल ‘सावधानी से चलें’ का बोर्ड लगा देना प्रशासनिक जिम्मेदारी की इतिश्री नहीं हो सकती। यदि कोई स्थान लगातार दुर्घटना का केंद्र बन रहा है तो सड़क की डिजाइन भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

बच्चों की सुरक्षा इसी व्यापक दृष्टिकोण की विशेष मांग करती है। विद्यालयों के आसपास तेज यातायात, असुरक्षित क्रॉसिंग और दोपहिया वाहनों की भीड़ बच्चों के लिए विशेष खतरा पैदा करती है। स्कूल क्षेत्रों को केवल शिक्षण संस्थानों की सीमा न मानकर सुरक्षित यातायात क्षेत्र के रूप में विकसित करना चाहिए। वहाँ नियंत्रित गति, पैदल-पथ, सुरक्षित क्रॉसिंग, यातायात निगरानी और व्यवस्थित वाहन-प्रबंधन आवश्यक हैं। किसी परिवहन नीति की संवेदनशीलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी होना चाहिए कि वह बच्चों को कितना सुरक्षित रखती है।

दुर्घटना के बाद की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दुर्घटना को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन दुर्घटना के बाद मृत्यु को कई बार रोका जा सकता है। दुर्घटना स्थल से अस्पताल तक पहुंचने में लगा समय जीवन और मृत्यु का अंतर बन सकता है। इसलिए एंबुलेंस नेटवर्क, ट्रॉमा सेंटर, प्राथमिक उपचार और आपातकालीन चिकित्सा को सड़क सुरक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए। सुरक्षित सड़क का अर्थ केवल दुर्घटना-मुक्त सड़क नहीं, बल्कि ऐसी सड़क भी है जहाँ दुर्घटना होने पर घायल व्यक्ति को समय पर जीवनरक्षक उपचार मिल सके।

प्रवर्तन व्यवस्था की अपनी सीमाएँ हैं। यातायात पुलिस के पदों में कमी और मानव संसाधन का अभाव हर सड़क पर लगातार निगरानी को कठिन बनाता है। ऐसी स्थिति में तकनीक उपयोगी हो सकती है। स्वचालित गति निगरानी, कैमरा आधारित उल्लंघन पहचान और डिजिटल दंड व्यवस्था प्रवर्तन को अधिक निरंतर बना सकती है। साथ ही वाहन निर्माताओं की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। सीट बेल्ट रिमाइंडर जैसे सुरक्षा तंत्रों को छेड़छाड़ से सुरक्षित बनाना और वाहन की मूल सुरक्षा व्यवस्था में अनधिकृत बदलावों को रोकना आवश्यक है। सड़क सुरक्षा केवल चालक की जिम्मेदारी नहीं; वाहन निर्माता, सड़क निर्माता और नियामक संस्थाएँ भी इसके बराबर हिस्सेदार हैं।

मोटर वाहन संशोधन अधिनियम, 2019 ने सड़क सुरक्षा से जुड़े कई तंत्रों को मजबूत करने का प्रयास किया था, लेकिन कानून का अस्तित्व और उसके परिणाम एक ही बात नहीं हैं। यदि दुर्घटना और मृत्यु के आंकड़े अपेक्षित स्तर पर नहीं घटते, तो नीति की समीक्षा आवश्यक है। कानून की कठोरता तभी प्रभावी होती है जब उसके साथ प्रवर्तन की निश्चितता, सड़क की गुणवत्ता, वाहन सुरक्षा और नागरिक अनुशासन मौजूद हों। केवल दंड बढ़ाते जाने से सुरक्षित यातायात संस्कृति पैदा नहीं होती।

सबसे कठिन चुनौती शायद कानून नहीं, सामाजिक मानसिकता है। भारत में यातायात नियमों को कई बार सुविधा के अनुसार अपनाया जाने वाला सुझाव समझ लिया जाता है। हेलमेट को पुलिस से बचने और सीट बेल्ट को चालान से बचने की औपचारिकता मानना इसी मानसिकता का परिणाम है। जब तक समाज में यह बोध विकसित नहीं होगा कि यातायात नियम किसी अधिकारी की सुविधा के लिए नहीं, स्वयं जीवन की रक्षा के लिए हैं, तब तक कठोर कानून भी सीमित परिणाम देगा। सुरक्षित व्यवहार को सामाजिक प्रतिष्ठा और असुरक्षित व्यवहार को सामाजिक अस्वीकार्यता से जोड़ना होगा।

इसलिए सड़क सुरक्षा की लड़ाई में न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण होते हुए भी अंतिम नहीं है। न्यायपालिका व्यवस्था को झकझोर सकती है, सरकार संसाधन और नीति उपलब्ध करा सकती है, पुलिस प्रवर्तन कर सकती है, उद्योग सुरक्षित वाहन बना सकता है और नागरिक जिम्मेदार व्यवहार अपना सकते हैं। इन सभी कड़ियों के एक साथ काम करने पर ही सुरक्षित सड़क संभव है।

भारत को ऐसी सड़क सुरक्षा नीति चाहिए जो दुर्घटना के बाद दोषी खोजने से पहले दुर्घटना की संभावना घटाए और दुर्घटना होने पर उसके घातक परिणामों को सीमित करे। सड़क पर जीवन की रक्षा केवल चालक की सावधानी से नहीं होगी; इसके लिए सड़क की डिजाइन, वाहन तकनीक, गति नियंत्रण, प्रभावी कानून, सक्षम प्रशासन, त्वरित चिकित्सा और जिम्मेदार नागरिक संस्कृति-सभी को एक ही सुरक्षा-शृंखला में जोड़ना होगा। आखिर सुरक्षित सड़क वह नहीं है जिस पर कोई कभी गलती न करे; सुरक्षित सड़क वह है जो किसी की एक गलती को उसकी आखिरी गलती बनने से रोक सके।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *