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एक राष्ट्र, एक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की आवश्यकता पर चर्चा क्यों नहीं

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मुस्कान ठाकुर, देवघर, अर्की, सोलन

स्वास्थ्य केवल बीमारी का अभाव नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहने की अवस्था है। फिर भी भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में गहरी असमानता दिखाई देती है। आज हम “एक राष्ट्र, एक चुनाव” और “एक राष्ट्र, एक शिक्षा” जैसे विषयों पर चर्चा करते हैं, लेकिन “एक राष्ट्र, एक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली” पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रत्येक नागरिक को समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इसमें स्वास्थ्य का अधिकार, चिकित्सा सुविधा का अधिकार तथा गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है। इसलिए जब किसी मरीज को समय पर उपचार, सुरक्षित अस्पताल या आवश्यक सुविधाएँ नहीं मिलतीं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।

आज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अमीर और गरीब के बीच स्पष्ट असमानता दर्शाती है। एक ओर आधुनिक हवाई अड्डों पर विश्वस्तरीय सुविधाएँ उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक सरकारी अस्पतालों में स्वच्छ बिस्तर, साफ शौचालय, पीने का पानी और उचित वेंटिलेशन जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। क्या यात्रियों की सुविधा, जीवन बचाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है?

महानगरों में अत्याधुनिक अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि अनेक ग्रामीण क्षेत्र आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संसाधनों, डॉक्टरों और नर्सों की कमी से जूझ रहे हैं तथा आपातकालीन सेवाएँ भी पर्याप्त नहीं हैं। परिणामस्वरूप मरीजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और कई बार समय पर उपचार न मिलने से उनकी मृत्यु हो जाती है। आज भी अनेक गाँव सड़क सुविधा से वंचित हैं, जहाँ एम्बुलेंस नहीं पहुँच पाती और बीमारों को कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ता है। गाँव में रहना किसी की मृत्यु का कारण नहीं बनना चाहिए; सड़क केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की डोर है।

स्वास्थ्य संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची का विषय है, जो मेरी दृष्टि में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बाधा है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2025 तक पश्चिम बंगाल ने आयुष्मान भारत योजना को लागू नहीं किया था। मेरा मानना है कि स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय को समवर्ती सूची में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि केंद्र और राज्य मिलकर पूरे देश में समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित कर सकें।

स्वास्थ्य व्यवस्था का एकीकरण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जिस राष्ट्र के परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने को मजबूर हों, वह राष्ट्र वास्तविक अर्थों में विकसित नहीं बन सकता। ‘एक राष्ट्र, एक स्वास्थ्य’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि विकसित, समावेशी और संवैधानिक भारत की अनिवार्य आवश्यकता है।

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Author: speedpostnews

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