अवनीश कुमार गुप्ता
भारतीय लोकतंत्र की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसकी संस्थागत विश्वसनीयता है। संविधान ने शासन व्यवस्था के तीन प्रमुख स्तंभ-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—को परस्पर संतुलन एवं नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था में स्थापित किया है, जिससे किसी भी संस्था के हाथों में निरंकुश शक्ति केंद्रित न हो सके। इनमें न्यायपालिका को विशेष स्थान प्राप्त है क्योंकि वही संविधान की अंतिम व्याख्याकार, मौलिक अधिकारों की संरक्षक तथा शासन की वैधानिकता की अंतिम कसौटी मानी जाती है। न्यायालयों के प्रति नागरिकों का विश्वास केवल उनके निर्णयों से नहीं बल्कि न्यायाधीशों की निष्पक्षता, नैतिक आचरण और सार्वजनिक जीवन की शुचिता से भी निर्मित होता है। इसलिए जब किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगते हैं, तब वह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़ा विवाद इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके विरुद्ध लगे आरोपों, आंतरिक जांच, संसद में महाभियोग की प्रक्रिया, उसके बीच दिए गए इस्तीफे तथा उसके बाद उत्पन्न संवैधानिक अनिश्चितता ने भारतीय न्यायिक व्यवस्था की कई संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है। यह घटनाक्रम केवल कानूनी विवाद नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली का परीक्षण भी है। आपकी साझा की गई सामग्री स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि महाभियोग की संवैधानिक व्यवस्था में मूल समस्या संविधान की रचना में नहीं बल्कि समय के साथ विकसित हुई उन प्रक्रियाओं और न्यायिक व्याख्याओं में उत्पन्न हुई है, जिन्होंने जवाबदेही की प्रभावशीलता को सीमित कर दिया।
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने के उद्देश्य से न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया अत्यंत कठिन बनाई थी। संविधान सभा में इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ और अंततः यह सहमति बनी कि उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को केवल संसद द्वारा विशेष बहुमत से पारित महाभियोग प्रस्ताव और राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से ही पद से हटाया जा सके। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि न्यायाधीश सरकार के दबाव या राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार न बनें। संविधान सभा के सदस्यों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा माना और इसी कारण हटाने की प्रक्रिया को असाधारण रूप से कठोर बनाया।
यद्यपि उस समय यह व्यवस्था उपयुक्त प्रतीत होती थी, किंतु सात दशकों के अनुभव ने यह सिद्ध कर दिया है कि अत्यधिक कठिन प्रक्रिया कभी-कभी जवाबदेही के उद्देश्य को ही कमजोर कर देती है। महाभियोग की शुरुआत से लेकर अंतिम निर्णय तक अनेक संवैधानिक और राजनीतिक चरण होते हैं। जांच समिति का गठन, उसकी रिपोर्ट, संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत तथा अंततः राष्ट्रपति की स्वीकृति—इन सभी चरणों के कारण प्रक्रिया लंबी और जटिल बन जाती है। यदि किसी भी स्तर पर राजनीतिक सहमति का अभाव हो जाए या संबंधित न्यायाधीश इस्तीफा दे दें, तो पूरी प्रक्रिया अधर में लटक सकती है। परिणामस्वरूप जनता के मन में यह धारणा बनने लगती है कि न्यायपालिका के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई लगभग असंभव है।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले ने इसी संवैधानिक जटिलता को प्रत्यक्ष रूप से सामने रखा। उनके द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए इस्तीफे के बाद भी प्रश्न यह बना रहा कि क्या महाभियोग की प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाएगी अथवा संसदीय जांच जारी रहेगी। साझा आलेख में उल्लेखित है कि जांच समिति ने अपना कार्य जारी रखा और रिपोर्ट भी प्रस्तुत की, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सार्वजनिक हित केवल किसी व्यक्ति के पद पर बने रहने या हटने तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्य का सार्वजनिक रूप से स्थापित होना भी उतना ही आवश्यक है।
यह विवाद न्यायपालिका की आंतरिक जांच प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है। वर्तमान व्यवस्था में प्रारंभिक जांच प्रायः न्यायपालिका द्वारा गठित आंतरिक समितियों के माध्यम से होती है। यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के उद्देश्य से बनाई गई थी, किंतु आधुनिक लोकतंत्र में केवल संस्थागत स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं मानी जाती। जनता यह भी अपेक्षा करती है कि जांच प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध तथा निष्पक्ष दिखाई दे। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यदि जांच की प्रक्रिया लंबे समय तक गोपनीय बनी रहती है या उसके निष्कर्ष स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं किए जाते, तो न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर अनावश्यक संदेह उत्पन्न होने लगता है।
इतिहास पर दृष्टि डालने से भी स्पष्ट होता है कि भारत में न्यायाधीशों के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया अपेक्षित परिणाम देने में सफल नहीं रही है। न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध महाभियोग राजनीतिक कारणों से आवश्यक बहुमत प्राप्त नहीं कर सका। न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरन तथा न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के मामलों में इस्तीफे के कारण प्रक्रिया अधूरी रह गई। इन घटनाओं ने यह संदेश दिया कि यदि कोई न्यायाधीश अंतिम मतदान से पहले इस्तीफा दे देता है तो महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो सकती है। साझा आलेख भी इन्हीं ऐतिहासिक उदाहरणों को वर्तमान व्यवस्था की कमजोरी के रूप में प्रस्तुत करता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न भ्रष्टाचार संबंधी जांच की प्रक्रिया से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध ‘के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ’ निर्णय के बाद न्यायाधीशों के विरुद्ध आपराधिक जांच प्रारंभ करने के लिए अतिरिक्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा विकसित हुई। इसका उद्देश्य न्यायाधीशों को राजनीतिक उत्पीड़न से बचाना था, किंतु व्यवहार में इस व्यवस्था ने अनेक मामलों में प्रारंभिक जांच को भी कठिन बना दिया। परिणामस्वरूप कई बार तथ्य-संग्रह की प्रक्रिया सीमित रह जाती है और जनता के सामने आरोपों का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट नहीं हो पाता। साझा सामग्री इसी पहलू को विस्तार से रेखांकित करती है कि अत्यधिक प्रक्रियात्मक सुरक्षा कभी-कभी जवाबदेही की प्रभावशीलता को कमजोर कर देती है।
लोकतांत्रिक शासन में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि पूरक सिद्धांत माना जाना चाहिए। यदि न्यायपालिका पूर्णतः स्वतंत्र हो लेकिन उसके भीतर प्रभावी उत्तरदायित्व का अभाव हो तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि जवाबदेही के नाम पर राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ जाए तो न्यायिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि ऐसा संस्थागत ढांचा विकसित किया जाए जिसमें न्यायाधीश राजनीतिक दबाव से मुक्त रहें, किंतु उनके आचरण की निष्पक्ष जांच भी सुनिश्चित हो सके।
विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों ने इस दिशा में स्वतंत्र न्यायिक आचरण आयोग, न्यायिक अनुशासन परिषद तथा सार्वजनिक शिकायत निवारण तंत्र विकसित किए हैं। भारत में भी लंबे समय से राष्ट्रीय न्यायिक आयोग अथवा स्वतंत्र न्यायिक आचरण प्राधिकरण जैसी संस्थाओं पर चर्चा होती रही है। यद्यपि इन प्रस्तावों पर व्यापक सहमति अभी तक नहीं बन सकी है, परंतु वर्तमान घटनाक्रम यह संकेत देता है कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए संस्थागत सुधारों पर गंभीरता से विचार करना समय की आवश्यकता बन चुका है।
महाभियोग प्रक्रिया में समयबद्धता का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी के विरुद्ध वर्षों तक लंबित रहने वाली जांच न केवल संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है बल्कि न्यायपालिका की संस्थागत साख को भी नुकसान पहुँचाती है। यदि जांच निर्धारित समयसीमा में पूर्ण हो, उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा संसद भी निश्चित अवधि में निर्णय ले, तो पूरी प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय बन सकती है। इसी प्रकार यदि महाभियोग के दौरान कोई न्यायाधीश इस्तीफा देता है तो कानून में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जांच और संसदीय विमर्श स्वतः समाप्त नहीं होंगे, क्योंकि उनका उद्देश्य केवल पद से हटाना नहीं बल्कि सार्वजनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना भी है।
आज आवश्यकता केवल किसी एक मामले पर प्रतिक्रिया देने की नहीं बल्कि व्यापक न्यायिक सुधारों की है। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, आचार संहिता का प्रभावी क्रियान्वयन, संपत्ति संबंधी घोषणाओं की नियमित व्यवस्था, शिकायतों की स्वतंत्र जांच, समयबद्ध अनुशासनात्मक प्रक्रिया तथा संसद और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट संवैधानिक समन्वय जैसे सुधार भविष्य में ऐसे विवादों को कम कर सकते हैं। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहेगी और जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी उसकी न्याय व्यवस्था में नागरिकों का विश्वास है। यह विश्वास केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्मित होता है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का प्रकरण हमें यह स्मरण कराता है कि किसी भी लोकतंत्र में संस्थाओं की प्रतिष्ठा व्यक्तियों से बड़ी होती है। यदि किसी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता हो तो उसे स्वीकार करना संस्थागत कमजोरी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है। आज समय की मांग है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए जवाबदेही की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट, पारदर्शी, त्वरित और प्रभावी बनाया जाए। यही वह मार्ग है जो संविधान की मूल भावना, विधि के शासन और लोकतांत्रिक विश्वास—तीनों की समान रूप से रक्षा कर सकता है। इसी संतुलन में भारतीय न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति और भविष्य की विश्वसनीयता निहित है।
(वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश)


