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लुई ब्रेल दिवस : उंगलियों से पढ़ी जाने वाली आजादी

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कांतिलाल मांडोत

हर साल चार जनवरी को दुनिया भर में लुई ब्रेल दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक आविष्कारक लुई ब्रेल की जयंती भर नहीं है, बल्कि उस विचार का उत्सव है जिसने अंधे और आंशिक रूप से दृष्टिबाधित लोगों के लिए ज्ञान, आत्मनिर्भरता और सम्मान के दरवाज़े खोले। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2018 में इस दिवस की औपचारिक स्थापना की, ताकि ब्रेल लिपि को एक सुलभ, मानवीय और अधिकार-आधारित संचार माध्यम के रूप में वैश्विक मान्यता मिल सके। ब्रेल केवल अक्षरों की व्यवस्था नहीं, बल्कि उँगलियों से पढ़ी जाने वाली आज़ादी है। एक ऐसा साधन जो शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक सहभागिता के रास्ते खोलता है।
ब्रेल का जन्म 19वीं सदी के फ्रांस में हुआ, जब स्वयं दृष्टिबाधित लुई ब्रेल ने उभरे हुए बिंदुओं की प्रणाली विकसित की। छह बिंदुओं का यह संयोजन आज सैकड़ों भाषाओं, गणितीय संकेतों, संगीत और विज्ञान तक फैला हुआ है। समय बदला, तकनीक बदली, लेकिन ब्रेल का मूल उद्देश्य वही रहा। दृष्टिबाधित व्यक्ति को किसी पर निर्भर किए बिना पढ़ने, लिखने और समझने का अधिकार देना। संयुक्त राष्ट्र ने जब इसे मानवाधिकारों से जोड़ा, तो संदेश स्पष्ट था कि सूचना तक पहुँच कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि अधिकार है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में ब्रेल का महत्व और भी गहरा हो जाता है। यहां करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में दृष्टिबाधित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुँच पहले से ही चुनौतीपूर्ण है, ऐसे में ब्रेल विद्यालय, पुस्तकालय और शिक्षण सामग्री आत्मनिर्भरता की नींव रखते हैं। भारतीय भाषाओं में ब्रेल का विकास हिंदी, मराठी, तमिल, बंगाली, उर्दू सहित यह सुनिश्चित करता है कि भाषा बाधा न बने। सरकारी योजनाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं, बैंकिंग सेवाओं और सार्वजनिक सूचनाओं में ब्रेल की मौजूदगी भारत में समावेशी विकास की कसौटी बनती जा रही है।
भारत को ब्रेल से एक और बड़ा लाभ सामाजिक बराबरी के रूप में मिलता है। जब दृष्टिबाधित छात्र सामान्य विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ब्रेल के सहारे पढ़ते हैं, तो वे मुख्यधारा का हिस्सा बनते हैं। इससे समाज में संवेदनशीलता बढ़ती है और दया’ की जगह अधिकार का भाव मजबूत होता है। हाल के वर्षों में डिजिटल ब्रेल डिस्प्ले, स्क्रीन रीडर और ब्रेल प्रिंटर जैसे उपकरणों के साथ भारत में स्टार्टअप और तकनीकी संस्थान भी आगे आए हैं। यह नवाचार न केवल रोजगार के अवसर पैदा करता है, बल्कि देश को सहायक तकनीक के वैश्विक मानचित्र पर भी स्थान दिलाता है।
दूसरी ओर, अमेरिका जैसे विकसित देश के लिए ब्रेल का महत्व अलग संदर्भ में दिखाई देता है। यहां दृष्टिबाधित समुदाय के अधिकारों की लड़ाई लंबे समय से संगठित रही है। अमेरिकी कानूनों में सुलभता के स्पष्ट मानक हैं।सार्वजनिक भवनों में ब्रेल साइन, परिवहन व्यवस्था में स्पर्श आधारित सूचना, शिक्षा संस्थानों में ब्रेल पाठ्यपुस्तकें। अमेरिका में ब्रेल को केवल पारंपरिक माध्यम नहीं माना जाता, बल्कि इसे आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा गया है। डिजिटल ब्रेल नोटटेकर, स्मार्टफोन से जुड़ने वाले ब्रेल डिस्प्ले और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सहायक उपकरण दृष्टिबाधित लोगों को तेज़ी से बदलती दुनिया से जोड़ते हैं।
अमेरिका को ब्रेल से जो लाभ मिलता है, वह उसकी समावेशी अर्थव्यवस्था में झलकता है। जब दृष्टिबाधित नागरिक स्वतंत्र रूप से पढ़-लिख सकते हैं, तो वे कार्यबल में सक्रिय भागीदारी करते हैं। इससे उत्पादकता बढ़ती है और सामाजिक सुरक्षा पर निर्भरता कम होती है। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में ब्रेल के माध्यम से विज्ञान, गणित और कानून जैसे विषयों में अध्ययन संभव हुआ है, जिससे दृष्टिबाधित पेशेवर डॉक्टर, वकील और वैज्ञानिक बनकर उभरे हैं। यह अमेरिका की विविधता और समान अवसर की अवधारणा को मज़बूत करता है।
हालाँकि भारत और अमेरिका दोनों देशों की चुनौतियाँ अलग हैं। भारत में सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों और पहुँच की है। ब्रेल पुस्तकें महंगी हैं, उत्पादन सीमित है और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी भी महसूस होती है। कई सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक स्थानों पर आज भी ब्रेल संकेत नहीं मिलते। वहीं अमेरिका में चुनौती यह है कि बढ़ती डिजिटल निर्भरता के बीच कहीं ब्रेल का अभ्यास कम न हो जाए। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल ऑडियो तकनीक पर निर्भरता साक्षरता को कमजोर कर सकती है, क्योंकि सुनना और पढ़ना दोनों की भूमिका अलग होती है।
यहीं विश्व ब्रेल दिवस का संदेश वैश्विक बन जाता है। यह दिन याद दिलाता है कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत हो जाए, ब्रेल की प्रासंगिकता खत्म नहीं होती। भारत जैसे देश के लिए यह अवसर है कि वह ब्रेल शिक्षा में निवेश बढ़ाए, स्थानीय भाषाओं में सामग्री विकसित करे और डिजिटल ब्रेल को सस्ता बनाए। अमेरिका के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि वह ब्रेल को नई पीढ़ी के लिए आकर्षक और सुलभ बनाए, ताकि साक्षरता की जड़ें मजबूत रहें।
ब्रेल का महत्व केवल शिक्षा या रोजगार तक सीमित नहीं है। यह गरिमा और आत्मसम्मान से जुड़ा है। जब कोई दृष्टिबाधित व्यक्ति ब्रेल में अपना नाम पढ़ता है, बैंक का फॉर्म भरता है या मेट्रो स्टेशन पर दिशा-सूचक संकेत समझता है, तो वह समाज में अपनी बराबरी महसूस करता है। यही बराबरी लोकतंत्र की आत्मा है।चाहे वह भारत हो या अमेरिका।
विश्व ब्रेल दिवस हमें यह भी सिखाता है कि समावेशन किसी एक देश का लक्ष्य नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस दिवस की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि मानवाधिकारों की भाषा सार्वभौमिक है। ब्रेल उस भाषा का स्पर्श आधारित रूप है, जो सीमाओं से परे जाकर इंसान को इंसान से जोड़ता है।
अंत में ब्रेल का भविष्य भारत और अमेरिका,दोनों के हाथों में है। भारत अपनी जनसंख्या और भाषाई विविधता के साथ इसे जनआंदोलन बना सकता है, वहीं अमेरिका तकनीकी नवाचार के ज़रिये इसे नई ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। जब दोनों देशों के अनुभव और प्रयास मिलेंगे, तब ब्रेल केवल लिपि नहीं, बल्कि वैश्विक समावेशन का प्रतीक बन जाएगा। 4 जनवरी का दिन इसी उम्मीद की याद दिलाता है कि उँगलियों से पढ़ी जाने वाली यह आज़ादी दुनिया के हर कोने तक पहुँचे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं)

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Author: speedpostnews

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