साहिल शर्मा
भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य सेवाएँ सिर्फ एक विभाग का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। कोरोना महामारी के बाद यह बात और स्पष्ट हो गई कि एक देश की असली शक्ति उसकी स्वास्थ्य प्रणाली ही है। भारत ने इस संकट में कई सकारात्मक कदम उठाए, लेकिन साथ ही कई ऐसी कमजोरियाँ भी उजागर हुईं, जिनसे यह साफ़ हो गया कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को तत्काल और गहरे सुधारों की आवश्यकता है। आज भी लाखों लोग बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी, दवाइयों की अनुपलब्धता, डॉक्टरों का अभाव और कमजोर बुनियादी ढाँचा आम समस्याएँ हैं। वहीं, शहरी क्षेत्रों में निजी अस्पतालों का बढ़ता वर्चस्व इलाज को इतना महँगा बना देता है कि मध्यम वर्ग भी भयभीत रहता है। इन परिस्थितियों में स्वास्थ्य पर सरकारी निवेश बढ़ाना देश की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है।
भारत की वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था सरकारी और निजी—दोनों क्षेत्रों पर आधारित है। निजी अस्पतालों में आधुनिक सुविधाएँ और तेज़ सेवा तो है, लेकिन वे आम आदमी की पहुँच से बाहर होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य खर्च भारत में गरीबी का एक बड़ा कारण बन चुका है। हर साल लाखों परिवार सिर्फ इलाज के कारण कर्ज़ में डूब जाते हैं या अपनी जमा-पूँजी खत्म कर देते हैं। दूसरी ओर, सरकारी अस्पतालों की स्थिति कई जगह इतनी कमजोर है कि लोग मजबूरी में निजी संस्थानों का रुख करने पर मजबूर होते हैं। इससे एक असंतुलित स्वास्थ्य प्रणाली बन रही है, जहाँ गरीब और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी समस्या है—GDP का बेहद कम हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च होना। जब किसी देश का स्वास्थ्य बजट कम होता है, तो अस्पतालों में न मशीनें होती हैं, न पर्याप्त बेड, न ICU और न ही प्रशिक्षित कर्मी। ग्रामीण भारत में स्थिति और गंभीर है। देश की अधिकांश आबादी गाँवों में रहती है, फिर भी विशेषज्ञ डॉक्टर वहाँ बहुत कम जाते हैं। कई PHC और CHC सिर्फ नाम के लिए चल रहे हैं। दूर-दराज़ इलाके आज भी प्रसव, टीकाकरण, प्राथमिक जांच और आपातकालीन सेवाओं के लिए शहरों पर निर्भर हैं। यात्रा का खर्च, समय की बर्बादी और अस्पतालों में भीड़—ये सभी चुनौतियाँ एक लंबी श्रृंखला बनाती हैं।
डॉक्टर–मरीज अनुपात भी भारत की बड़ी चुनौती है। WHO के मानक के अनुसार एक डॉक्टर पर हजार मरीज होने चाहिए, लेकिन भारत कई राज्यों में इस मानक से बहुत नीचे है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति धीमी है, और जो नियुक्त होते हैं, उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में भेजना कठिन होता है क्योंकि वहाँ न सुविधाएँ हैं, न सुरक्षा, न ही आवास। ऐसी स्थिति में ग्रामीण स्वास्थ्य ढाँचा सुधारना मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओर, निजी अस्पतालों में डॉक्टरों और आधुनिक उपकरणों की कमी नहीं, लेकिन अत्यधिक खर्च के कारण उनकी पहुँच सीमित रहती है।
बीमारियों के मामले में भारत दो मोर्चों पर लड़ रहा है—संक्रामक और गैर-संक्रामक रोग। TB, मलेरिया, डेंगू, वायरल बुखार जैसी बीमारियाँ अब भी चुनौती हैं। वहीं, डायबिटीज़, हार्ट डिज़ीज़, हाई BP, कैंसर, किडनी रोग और मानसिक तनाव जैसी जीवनशैली आधारित बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। इन बीमारियों की जांच और इलाज दोनों महँगे हैं। गरीब और मध्यम वर्ग दोनों इस बोझ के नीचे दबते जा रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि भारत को सिर्फ अस्पताल बढ़ाने की नहीं, बल्कि रोकथाम, पोषण, स्वच्छता और जागरूकता जैसी बुनियादी चीजों पर भी ध्यान देना होगा।
केंद्र और राज्यों द्वारा कई प्रयास किए गए हैं। आयुष्मान भारत – PMJAY ने गरीबों को भारी राहत दी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) ने ग्रामीण क्षेत्रों में सुधार का प्रयास किया। जन औषधि केंद्रों ने दवाइयाँ सस्ती कीं। टेलीमेडिसिन सेवाओं ने दूरदराज़ के क्षेत्रों तक डॉक्टर पहुँचाए। लेकिन इन योजनाओं का पूर्ण लाभ तभी मिलेगा जब इन्हें प्रभावी तरीके से लागू किया जाए। कई जगह योजनाएँ कागज़ों में चलती हैं, लेकिन ज़मीन पर असर सीमित रहता है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। सबसे पहला और ज़रूरी कदम—स्वास्थ्य बजट को बढ़ाना। अधिक अस्पताल, अधिक डॉक्टर, आधुनिक मशीनें, आपातकालीन सेवाएँ और बेहतर प्रशिक्षण तभी संभव हैं जब फंडिंग बढ़ेगी। दूसरे, डॉक्टरों और नर्सों की बड़ी संख्या में नियुक्ति की जाए और उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिए आकर्षक सुविधाएँ दी जाएँ। तीसरे, सरकारी अस्पतालों को तकनीक के साथ जोड़ा जाए—डिजिटल रिकॉर्ड, AI डायग्नोसिस, स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम और आधुनिक लैब्स से उन्हें मजबूत किया जाए। चौथे, निजी अस्पतालों पर नियंत्रण रखा जाए ताकि वे मनमाने दाम न वसूल सकें। इलाज एक व्यापार नहीं, सेवा है—इस मान्यता को व्यवहार में लाना जरूरी है। पांचवें, स्वास्थ्य बीमा को ऐसा बनाया जाए कि मध्यम वर्ग भी सुरक्षित रहे। आज सबसे ज्यादा बोझ इसी वर्ग पर आता है।
अंत में, स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत सुविधा नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति है। एक स्वस्थ नागरिक ही समाज और देश के विकास में योगदान दे सकता है। भारत आर्थिक विकास, तकनीकी उन्नति और वैश्विक नेतृत्व की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन इन सबकी नींव एक मजबूत और सुलभ स्वास्थ्य व्यवस्था ही है। यदि देश को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनाना है, तो स्वास्थ्य क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देना ही होगी। यह निवेश खर्च नही, बल्कि देश के भविष्य में सबसे महत्वपूर्ण पूँजी है।
(लेखक हमीरपुर जिला की ढटवाल तहसील के चकमोह के बाहल अर्जुन गांव के रहने वाले हैं)



