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भारत-अमेरिका ट्रेड डील : धैर्य, दूरदृष्टि और आर्थिक आत्मविश्वास की जीत

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कांतिलाल मांडोत
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापार वार्ताओं का सकारात्मक नतीजा सामने आना केवल एक समझौता भर नहीं है, बल्कि यह भारत की बदली हुई वैश्विक आर्थिक हैसियत, कूटनीतिक परिपक्वता और नीतिगत स्थिरता का प्रमाण है। टैरिफ दरों में 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत तक की कटौती के बाद जिस तरह से शेयर बाजार, कमोडिटी मार्केट और मुद्रा बाजार में उत्साह दिखा, उसने साफ कर दिया कि यह फैसला केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी अर्थव्यवस्था को गति देने वाला है। सेंसेक्स और निफ्टी का रिकॉर्ड तेजी के साथ बंद होना, निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में करीब 12 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी और रुपये की तीन साल की सबसे बड़ी मजबूती, यह सब बाजार की उस भरोसे की अभिव्यक्ति है जो मौजूदा सरकार की आर्थिक नीतियों पर दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए संसदीय दल की बैठक में इस समझौते को धैर्य और दूरदृष्टि का परिणाम बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आलोचनाएं होती रहीं, दबाव भी था, लेकिन सरकार ने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना संयम बनाए रखा। आज उसी का परिणाम है कि भारत एक मजबूत सौदे की स्थिति में खड़ा है। यह बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि उन तथ्यों से भी पुष्ट होता है जो बाजार और वैश्विक संकेतकों में दिख रहे हैं। ट्रेड डील के ऐलान के तुरंत बाद निवेशकों का भरोसा बढ़ा, विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां तेज हुईं और घरेलू निवेशकों ने भी आक्रामक खरीदारी की।
विपक्ष की ओर से यह आरोप लगाया जा रहा है कि यह समझौता किसानों और घरेलू उद्योगों के हितों के खिलाफ है, लेकिन ये आरोप वास्तविकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। सरकार ने साफ किया है कि कृषि और संवेदनशील क्षेत्रों में भारत के हितों की पूरी तरह रक्षा की गई है। किसी भी तरह का ऐसा प्रावधान नहीं किया गया है जिससे भारतीय किसानों को नुकसान पहुंचे। वास्तव में, यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच सुनिश्चित करता है, जिससे कृषि उत्पादों के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र को भी लाभ होगा। यह कहना कि भारत ने दबाव में आकर रियायतें दी हैं, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने जैसा है।
कमोडिटी बाजार की बात करें तो सोना और चांदी में आई तेजी यह दर्शाती है कि निवेशक इस समझौते को दीर्घकालिक रूप से सकारात्मक मान रहे हैं। बीते कुछ दिनों की गिरावट के बाद सोने के दामों में करीब 8,200 रुपये की बढ़ोतरी और चांदी में 14 प्रतिशत से अधिक का उछाल केवल सट्टा नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता की उम्मीद का संकेत है। आम तौर पर जब निवेशकों को भविष्य पर भरोसा होता है, तो वे जोखिम और सुरक्षित निवेश दोनों में संतुलन बनाते हैं। यही रुझान इस समय भारतीय बाजारों में देखने को मिल रहा है।
रुपये में मजबूती भी इस पूरी तस्वीर का अहम हिस्सा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की तीन साल की सबसे बड़ी बढ़त यह बताती है कि भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। विदेशी मुद्रा भंडार, चालू खाते का प्रबंधन और निर्यात संभावनाओं में सुधार, इन सभी का संयुक्त प्रभाव मुद्रा बाजार में दिखा है। यह मजबूती आयात लागत को नियंत्रित करने में मदद करेगी, जिससे महंगाई पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। आम नागरिक के लिए इसका मतलब है कि ईंधन, खाद्य तेल और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
सरकार का यह दावा भी महत्वपूर्ण है कि आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 500 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस तरह से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी जगह मजबूत की है, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के जरिए उत्पादन क्षमता बढ़ाई है, उससे यह लक्ष्य यथार्थवादी लगता है। अमेरिकी कृषि मंत्री के बयान को लेकर विपक्ष भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि किसी भी द्विपक्षीय समझौते में दोनों पक्षों को लाभ होता है। यदि अमेरिकी कृषि निर्यात बढ़ता है, तो भारतीय उपभोक्ताओं को भी प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बेहतर विकल्प मिलते हैं, जबकि भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में नई संभावनाएं मिलती हैं।
एनडीए संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री का सांसदों से अनुशासन और सक्रियता पर जोर देना भी इस पूरे घटनाक्रम को व्यापक संदर्भ में देखने का संकेत है। सरकार केवल समझौते कर लेने से संतुष्ट नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहती है कि संसद की कार्यवाही प्रभावी हो, नीतियों पर सार्थक चर्चा हो और बजट व आर्थिक फैसलों की जानकारी आम लोगों तक पहुंचे। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की सोच को दर्शाता है। विपक्ष जहां हर मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति अपनाता है, वहीं सरकार का फोकस परिणाम और संवाद दोनों पर है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस समझौते के बाद उद्योग जगत से लेकर छोटे निवेशकों तक में एक नई ऊर्जा दिख रही है। अडाणी, रिलायंस और प्रमुख वित्तीय कंपनियों के शेयरों में आई तेजी केवल बड़े कॉरपोरेट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी देखने को मिला। इससे रोजगार सृजन, निवेश चक्र और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना बढ़ती है। यही कारण है कि बाजार विश्लेषक इसे पिछले कई महीनों की सबसे मजबूत रैली मान रहे हैं।
विपक्ष का यह कहना कि सरकार अमेरिका के दबाव में झुकी है, उस बदलते वैश्विक परिदृश्य को नजरअंदाज करना है जिसमें भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक निर्णायक भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अहम हिस्सेदारी तक, भारत की आवाज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है। ऐसे में किसी भी समझौते को कमजोरी के चश्मे से देखना वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है।
कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका ट्रेड डील एक ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं से जूझ रही है। इस माहौल में भारत का आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना, निवेशकों का भरोसा जीतना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक साझेदारी को मजबूत करना, सरकार की नीतिगत स्पष्टता को दर्शाता है। यह समझौता केवल आज के बाजार आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक दिशा और वैश्विक भूमिका को नई ऊंचाई देने वाला कदम साबित हो सकता है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं)

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Author: speedpostnews

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