साहिल शर्मा
मंदिर में घंटी बजाना आसान है,
पर मन का अहंकार
कौन उतारे?
माला सबके हाथ में है,
पर करुणा
किसी की आदत में नहीं।
सब कहते हैं-
हम धर्म को मानते हैं,
पर निभाता कोई नहीं।
धर्म अगर सच में निभाया जाता,
तो नफरत इतनी सस्ती
और इंसान इतना अकेला नहीं होता।
बाबा त्याग का उपदेश देते हैं,
और खुद
प्राइवेट जेट में उड़ान भरते हैं।
भक्त नंगे पाँव श्रद्धा में,
और संत
बुलेटप्रूफ़ शीशों में सुरक्षित।
अगर मोह-माया पाप है,
तो यह ऐश क्यों?
अगर त्याग ही धर्म है,
तो यह दिखावा क्यों?
धर्म सिखाता है-
सत्य, करुणा और न्याय,
पर आज धर्म के नाम पर
सबसे ज़्यादा
असत्य, क्रूरता और डर
बेचा जा रहा है।
मैं नास्तिक नहीं हूँ,
मैं विद्रोही भी नहीं,
मैं बस इतना कहता हूँ-
जहाँ सवाल पूछने पर
धर्म ख़तरे में पड़ जाए,
वहाँ धर्म नहीं,
धंधा चल रहा होता है।
चुप रहना भी एक जोखिम है,
यह अब समझ में आता है,
क्योंकि जब सज्जन चुप रहते हैं,
तब ढोंगी
धर्म के ठेकेदार बन जाते हैं।
मैं भगवान को मानता हूँ,
पर यह ढोंग मुझे स्वीकार नहीं।
आस्था शोर नहीं,
आचरण है-और वही असली धर्म की पहचान है।
(समकालीन हिंदी लेखक एवं कवि। लेखन का केंद्र लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, प्रशासनिक जवाबदेही, शिक्षा और आम आदमी के प्रश्न हैं। आपकी रचनाएँ सत्ता से सवाल करती हैं और समाज को आत्मचिंतन के लिए बाध्य करती हैं।
पता : ग्राम बाहल अर्जुन, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश
संपर्क : 8544705033)


