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अलग-अलग देशों की दोहरी नीति, यही आज वैश्विक राजनीति का यथार्थ

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साहिल शर्मा
आज का विश्व आपसी निर्भरता, वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के युग में प्रवेश कर चुका है। तकनीक ने दूरियों को कम किया है, व्यापार ने अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ा है और कूटनीति ने राष्ट्रों को संवाद के मंच पर लाकर खड़ा किया है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के भीतर एक ऐसी प्रवृत्ति लगातार दिखाई देती है, जो वैश्विक विश्वास को कमजोर करती है-वो है अलग-अलग देशों की दोहरी नीति। सार्वजनिक मंचों पर शांति, न्याय, मानवाधिकार और लोकतंत्र की बातें करने वाले कई राष्ट्र व्यवहार में अपने हितों के अनुसार अलग मानदंड अपनाते हैं। यही विरोधाभास अंतरराष्ट्रीय संबंधों को जटिल और अविश्वसनीय बना देता है।
दोहरी नीति का अर्थ है-एक ही प्रकार की परिस्थिति में अलग-अलग देशों के प्रति अलग व्यवहार। जब कोई शक्तिशाली देश अपने प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र के किसी कदम की कड़ी आलोचना करता है, प्रतिबंध लगाता है और अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाता है, लेकिन वही परिस्थिति उसके सहयोगी देश में उत्पन्न होने पर वह चुप्पी साध लेता है या नरम रुख अपनाता है, तो यह दोहरे मापदंड का स्पष्ट उदाहरण बन जाता है। यह स्थिति केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य सहयोग और कूटनीतिक समर्थन में भी दिखाई देती है।
मध्य-पूर्व की राजनीति इस संदर्भ में एक जटिल उदाहरण प्रस्तुत करती है। जब ईरान और इजरायल से जुड़े मुद्दों पर वैश्विक शक्तियाँ अपनी-अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर पक्ष लेती हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय निर्णय केवल नैतिकता पर आधारित नहीं होते, बल्कि भू-राजनीतिक हितों से संचालित होते हैं। कुछ देश सुरक्षा और स्थिरता के नाम पर किसी एक पक्ष का समर्थन करते हैं, जबकि वही देश अन्य क्षेत्रों में समान परिस्थितियों पर भिन्न रुख अपनाते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि अंतरराष्ट्रीय नियम सबके लिए समान नहीं हैं।
दोहरी नीति केवल युद्ध और सुरक्षा तक सीमित नहीं है; यह व्यापार और अर्थव्यवस्था में भी दिखाई देती है। कई विकसित देश मुक्त व्यापार और खुले बाजार की वकालत करते हैं, परंतु जब उनके घरेलू उद्योगों को खतरा महसूस होता है, तो वे संरक्षणवादी नीतियाँ लागू कर देते हैं। विकासशील देशों से आर्थिक सुधार और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है, जबकि स्वयं कई शक्तिशाली राष्ट्र अपने हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान बना लेते हैं। यह विरोधाभास वैश्विक व्यापार प्रणाली में असंतुलन पैदा करता है।
पर्यावरण के क्षेत्र में भी दोहरी नीति का प्रश्न उठता है। विकसित देश आज जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सख्त कदम उठाने की बात करते हैं और विकासशील देशों से कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपेक्षा रखते हैं। किंतु ऐतिहासिक रूप से औद्योगिक क्रांति से लेकर आज तक सबसे अधिक प्रदूषण उन्हीं देशों ने किया है। ऐसे में विकासशील देशों का तर्क है कि उन्हें विकास के अवसरों से वंचित नहीं किया जा सकता। जब जिम्मेदारी साझा करने की बात आती है, तो समानता का सिद्धांत अक्सर कमजोर पड़ जाता है।
मानवाधिकार के मुद्दे पर भी यही प्रवृत्ति देखी जाती है। कुछ देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के नाम पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जबकि अन्य देशों में समान परिस्थितियों के बावजूद चुप्पी साध ली जाती है। यह चयनात्मक सक्रियता अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जब वैश्विक मंचों पर न्याय और समानता की बात की जाती है, लेकिन व्यवहार में पक्षपात दिखाई देता है, तो छोटे और विकासशील देशों में अविश्वास बढ़ता है।
हालाँकि यह भी सत्य है कि हर राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि मानता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति आदर्शवाद से अधिक यथार्थवाद पर आधारित होती है। किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक हितों की रक्षा करना होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो दोहरी नीति कभी-कभी व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा प्रतीत होती है। परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यह प्रवृत्ति वैश्विक संतुलन और न्याय को प्रभावित करने लगती है।
दोहरी नीति के दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होती है, वैश्विक सहयोग में बाधा आती है और छोटे देशों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है। जब नियमों का पालन केवल कमजोर राष्ट्रों से अपेक्षित हो और शक्तिशाली राष्ट्र स्वयं को अपवाद मानें तो वैश्विक व्यवस्था अस्थिर हो जाती है। यह असंतुलन अंततः नए टकरावों और संघर्षों को जन्म दे सकता है।
समाधान की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम पारदर्शिता और समानता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों और समझौतों को इस प्रकार लागू किया जाना चाहिए कि वे सभी देशों पर समान रूप से लागू हों। शक्तिशाली राष्ट्रों को यह समझना होगा कि अल्पकालिक रणनीतिक लाभ दीर्घकालिक वैश्विक स्थिरता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। संवाद, पारस्परिक सम्मान और बहुपक्षीय सहयोग ही वह मार्ग है जो दोहरी नीति की प्रवृत्ति को कम कर सकता है।
अंततः, विश्व शांति और स्थिरता केवल हथियारों या आर्थिक शक्ति से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए नैतिक नेतृत्व, निष्पक्ष नीति और समान व्यवहार आवश्यक है। यदि वैश्विक राजनीति में न्याय और समानता को वास्तविक रूप से अपनाया जाए, तो अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिक संतुलित और विश्वसनीय बन सकते हैं। अन्यथा, दोहरे मापदंडों की यह प्रवृत्ति विश्व व्यवस्था को लगातार चुनौती देती रहेगी। यही समय की मांग है कि राष्ट्र अपने हितों के साथ-साथ वैश्विक उत्तरदायित्व को भी समान महत्व दें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ एक अधिक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण विश्व का अनुभव कर सकें।
(लेखक सामाजिक, शैक्षिक एवं समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं)

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Author: speedpostnews

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